फूलदेई - डाॅ० आभा भैंसोड़ा जी

 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में फूलदेई बाल त्योहार  के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत है, आज जनपद-नैनीताल से शिक्षिका बहिन डाॅ०आभा भैंसोड़ा जी द्वारा रचित कविता-


फूल देई


चैत्र माह संक्रान्ति होती,

जब घटने लगे, ठण्ड धीरे-धीरे।

ऊँची चोटियों पर पड़ी बर्फ,

जब पिघलती, बनती है नीरे।।

 

महीना सर्दी-गर्मी का संगम,

होता बड़ा ही दृश्य विहंगम।

प्राकृतिक छटा जब फूलों से, 

दूर करती अवसाद शूलों से।।

 


पीली फ्यूँली से चढ़ती हल्दी, 

लाल बुरांँश से सजती है माँग।

भेटुली फूलों से सजता आँचल,

लहंगे की गोट रंग-बिरंगा आँचल।।



फूलों से लकदक करती है,

प्रकृति अपना सोलह श्रृंगार।

चेली कुमाऊंँ की आशीष देती,

कहती है दैणों द्वार, भर भकार।।

  

 दुल्हन प्रकृति जब घूंँघट खोले,

 मुदित हर मन खाए हिचकोले।

 फूलों से कन्याएँ पूजें देई द्वार,

 फूल देई, छम्मा देई कहकर बोलें।।

 

 फूल देई, छम्मा देई, दैणों द्वार भर भकार।

 य देली सो नमस्कार, पूजे द्वार बारम्बार।।


🙏 रचना-:

डॉ० आभा सिंह भैसोड़ा (स०अ०)

रा० प्रा० वि०- देवलचौड़

ब्लाॅक - हल्द्वानी, नैनीताल




🙏संकलन-: टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड

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