होली- श्रीमती सावित्री आर्य जी

 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में होली पावन पर्व के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत है, आज जनपद- नैनीताल से शिक्षिका बहिन श्रीमती सावित्री आर्य जी द्वारा रचित कविता-


🙏✍️🌸होली 


फागुन मास बसन्त का मौसम,

लाया कई त्योहारों को संग।

पहले बसन्त पंचमी, शिवरात्रि,

फिर आई होली की बारी।।


एक था राजा हिरण्यकश्यप,

दुराचारी, सन्तों का भक्षक।

उसके पुत्र का प्रह्लाद नाम था,

जपता था जो नाम प्रभु का।।



हिरण्यकश्यप को रास न आया,

प्रहलाद का प्रभु नाम को जपना।

उसकी बहिन , होलिका को था,

वरदान आग में ना जलने का।।



बैठ गई वह जलती आग में,

ले प्रह्लाद को अपनी गोद में।

बचा प्रह्लाद, जली होलिका,

तभी से मनाते त्योहार होली का।।

🙏रचना-:

सावित्री आर्य (प्र०अ०)

रा० क० उ० प्रा० वि० छीडा़गांजा

वि० ख०- भीमताल, नैनीताल


🙏संकलन-: टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड

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