मैं एक नारी हूंँ-श्रीमती विजया सजवाण
📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में प्रस्तुत है, आज जनपद-चमोली से शिक्षिका बहिन श्रीमती विजया सजवाण जी द्वारा रचित कविता-
मैं एक नारी हूंँ
शरारत करूँ तो बेटी हूंँ,
देखभाल करूँ तो बहन हूंँ।
साथ चली तो साथी कहलायी,
फेरो में बँध पत्नी कहलायी।।
ममता भरी मैं एक माँ हूँ,
आशीष देती दादी माँ हूँ।
कभी सावित्री बनकर आयी,
कभी सीता बनकर छायी।।
अन्नपूर्णा बनकर खिलाती,
दुर्गा बनकर दिव्यता दिलाती।
कालों के लिए काली हूँ,
सुरों की मैं सरस्वती हूंँ।।
कभी लक्ष्मी बनकर आयी,
कभी बनी शीतला माई।
दिव्यता है मुझे मिली हुई,
फिर भी सादगी भरी हुई।।
कहीं छाया मुझसे कहीं धूप,
युग बदले-बदले मेरे रूप।
हर रूप में देखे मुझे संसार,
फिर भी मैं सब से करूँ प्यार।।
🙏रचना-:
विजया सजवाण (स०अ०)
रा० आ० प्रा० वि० गौचर
ब्लॉक- कर्णप्रयाग, चमोली
🙏संकलन-: टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड
सुन्दर रचना
जवाब देंहटाएंसाभार धन्यवाद
हटाएंबहुत सुन्दर सृजन
Very nice
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर
जवाब देंहटाएंबहुत बढ़िया कविता... शानदार
जवाब देंहटाएंसभी गुरुजनों का बहुत-बहुत धन्यवाद और डिमरी मैडम का विशेष आभार जिन्होंने मुझे प्रोत्साहन दिया
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर अभिव्यक्ति मैम
जवाब देंहटाएं🙏🌹बहुत सुंदर रचना🌹🙏
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर अभिव्यक्ति
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर
जवाब देंहटाएंसभी शिक्षक साथियों का बहुत-बहुत धन्यवाद
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर दीदी
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