श्रमिक दिवस विशेष-श्रीमती सरोज डिमरी जी

 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में मजदूर दिवस के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत है, आज जनपद- चमोली से शिक्षिका बहिन श्रीमती सरोज डिमरी जी द्वारा रचित कविता-:


श्रमिक दिवस विशेष


मुन्ना बोला मैं मजदूर, 

मुन्नी बोली मैं मजदूर।

पापा मम्मी हंँसकर बोले,

क्यों होते हो तुम मजबूर? 


पढ़ लिख कर के योग्य बन रहे,

नींव बनोगे तुम मजबूत।

अच्छे कार्य लगन से करना, 

 मेहनत देती सही सबूत।। 



श्रमिक दिवस पर बात उठे जब,

मन में जगा विश्वास अपार।

वैज्ञानिक युग में जी रहे, 

हैं नियत निरन्तर चमत्कार।। 


कर्म योग से ही बल बढ़ते, 

कर्म से सम्भव होते काज।

असम्भव तो कुछ भी नहीं, 

उद्यम से ही चमके सरताज।। 


 अमीरी गरीबी के भेद मिटाकर,

 लुटाओ मन के भाव अनमोल।

 नवनिर्मित पुल पर जा देखो,

मेहनत का ही ये है मोल।। 


खून पसीना अधिक बहाकर 

करते नित-नित नए प्रयास।

 हम तुम भी तो उद्यम कर लें, 

 फलें फूलें सब की आस।। 


चट्टानों के सर्वेक्षण से

सीधी रेखा बनने तक।

खुशी-खुशी काम वह करते, 

सब के कार्य सिद्ध होने तक।। 


 ऊंँचे आलीशान भवन बनाते,

 स्वयं झोपड़ी करे निवास।

 हानि-लाभ, घट-बढ़ पर भी 

खोते नहीं आत्मविश्वास।। 


अपने बच्चों की खातिर भी, 

 जाड़ा गर्मी सब सह लेते।

कृषकाय कृष्णवर्ण होकर भी, 

भाग्य को दोष कभी नहीं देते।। 


 हाथ हथौड़ी, छैनी लेकर

 छुटपुट करता रहता काम।

 दौड़-धूप कर दिन भर अपनी

कभी नहीं लेता विश्राम।। 


संतोषी व्यवहार बना कर, 

 स्वीकारता हांँ मैं हूंँ मजदूर।

 ऐसे उच्च कोटि मानव को, 

 साधुवाद देता मन भरपूर।। 


🙏 रचना-:

सरोज डिमरी (स०अ०) 

रा० आ० उ० प्रा० वि० गौचर

कर्णप्रयाग, चमोली


🙏संकलन-: टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड

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