माहे रमजान-श्री सुहेब हुसैन जी
📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में माहे रमजान पवित्र त्योहार के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत है, आज जनपद- रुद्रप्रयाग से शिक्षक साथी श्री सुहेब हुसैन जी द्वारा रचित कविता-:
🙏 ✍️माहे रमजान
देखो-देखो आ गया है,
फिर माहे रमजान।।
मिलकर खैरमकदम करें,
हम इसका भाईजान।।
आओ इबादत करें खुदा की,
जिसने तुमको पैदा किया।
रहमतों और बरकतों वाला,
ये माहे रमजान आया।।
पूरे रोजे रख कम कर लो,
गुनाह इस माहे रमजान।
भूख लगे ना प्यास लगे,
ऐसा है माहे रमजान।।
बच्चा, बूढ़ा, औरत, जवान,
रोजे सब माहे रमजान रखें।
ना अमीर ना गरीब कोई
मिलकर सब इफ़्तार करें।।
दो निवाले खा लेते हैं,
तड़के सेहरी में उठकर।
सबके दस्तरख्वान में बरकत,
ये ही अल्लाह से दुआ कर।।
दिन-भर भूखे प्यासे रहते,
शाम को इफ़्तार हैं करते।
उनतीस या तीस रोजे,
माहे रमजान में हैं होते।।
फर्क कुछ नहीं पड़ता,
कितने दिन का है रमजान।
हंँसते खेलते निकल गया,
सबसे अव्वल माहे रमजान।।
आ गयी ईद मनाएंँगे मिलकर,
नसीब हुआ है माहे रमजान।
खुशी के साथ दुआ है सबकी,
फिर मिल जाए माहे रमजान।।
🙏 रचना:-
सुहेब हुसैन (प्र०प्र०अ०)
रा० उ० प्रा० वि० सेमलता
वि० ख० जखोली, रुद्रप्रयाग
🙏संकलन-: टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड



टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें