अहा! हमलै चड़़ हुँना- श्रीमती गंगा आर्या जी
📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में प्रस्तुत है, आज जनपद- पिथौरागढ़ से शिक्षिका बहिन श्रीमती गंगा आर्या जी द्वारा रचित कविता-:
अहा! हमलै चड़़ हुँना
अहा! हमलै चड़़ हुँना,
दिन भरि यथै-उथै उड़नै रूँना।
नानतिन हमेंकैं दाण-पाणि दिन,
और हम उनुकैं मिठ-मिठ गीत सुड़ूँना।।
क्वैले हमन जब पकड़न,
हम फुर्र-फुर्र उड़ि जाना।
आपण मस्त चाल में उड़ना,
हवा दगड़ि बात करना।।
आपण चाल हुँनि, आपण ढंग हुँन,
न कैकै डर, न कैकै भय हुँन।
न स्कूल चक्कर काटण पड़न,
न काम-काज करन पड़न।।
बिन पैंसटाक कै देश-विदेश घुमना,
उड़ि-उड़ि भेर आकाश कैं चुमना।
बोट में आपण़ घर हुँन,
उति में आपण ठाटबाट हुँन।।
🙏 रचना-:
गंगा आर्या (प्र०अ०)
रा० प्रा० वि० भट्टीगाँव
वि० ख० - बेरीनाग, पिथौरागढ़
🙏संकलन :-टीम मिशन शिक्षण संवाद गढ़वाल-कुमाऊँ, उत्तराखण्ड

बहुत सुन्दर
जवाब देंहटाएंसुन्दर शुभकामना
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