माँ - श्रीमती इन्दु भट्ट

 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में मातृ दिवस पावन पर्व पर प्रस्तुत है आज जनपद- रुद्रप्रयाग से शिक्षिका बहिन श्रीमती इन्दु भट्ट जी द्वारा रचित कविता:-


🙏✍️माँ


माँ तप और तपस्या होती,

बचपन में न जाने कितने कष्ट उठाती।

गीले बिस्तर में खुद रहकर,

क्या-क्या और सहन करती।।


हर रोज, दिन माँ का होता,

कोई माँ का ॠण न चुका सकता।

माँ तप और तपस्या होती,

कूट-कूट कर ममता से भरी होती।।



माँ, पुकारने पर,

माँ नंगे पाँव दौड़ी आती।

पैरों में चुभ जाए काँटा,

पर एहसास नहीं कराती।।


मांँ की डाँट का भी जब जिक्र हो,

तो फिक्र हमारी ही होती।

माँ तप और तपस्या होती,

माँ सबसे अनमोल होती।।


माँ बचपन में जो खिलाया था,

वो खाना आज भी याद है माँ।

कभी गौशाला में जाकर,

वो गाय का दूध आज भी याद है माँ।।


🙏रचना-: 

इन्दु भट्ट (प्र०अ०अ०)

रा० प्रा० वि० रतनगढ़

ब्लाॅक- जखोली, रुद्रप्रयाग



🙏संकलन :-टीम मिशन शिक्षण संवाद गढ़वाल-कुमाऊँ, उत्तराखण्ड

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