ईद उल फित्र - श्री सुहेब हुसैन जी

 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में ईदोत्सव पवित्र त्योहार के सुअवसर पर ईद की मुबारकबाद के साथ प्रस्तुत है, आज जनपद- रुद्रप्रयाग से शिक्षक साथी श्री सुहेब हुसैन जी का लेख -:


"ईद उल फित्र"

ईद उल फित्र का पर्व इस्लाम धर्म को मानने वाले लोग जिन्हें मुस्लिम कहा जाता है, के द्वारा बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। ईद पर्व दो होते हैं- 

(1)पहला- ईद उल फित्र

(2)दूसरा- ईद उल अजहा

(जिसे बकरी ईद के नाम से भी जाना जाता है)

ईद उल फित्र, रमजान महीने के अंतिम रोजे के बाद, नया चाँद देखने के बाद अगले दिन मनाई जाती है। इसी ईद के चाँद से शव्वाल का महीना शुरू होता है।सबसे पहले चाँद सऊदी अरब में दिखता है क्योंकि पृथ्वी का पश्चिम से पूर्व दिशा की ओर घूमने के कारण सऊदी अरब पश्चिमी भाग पर होने के कारण वहाँ पर चाँद पहले दिखता है और हमारे देश भारत में अगले दिन दिखाई देता है जिस कारण हमारे देश में ईद दूसरे दिन मनायी जाती है।



ईद उल फित्र माहे रमजान के पूरे रोजे रखने के बाद कभी 29 रोजे पूरे होने के बाद चाँद दिखने पर तो कभी 30 रोजे पूरे होने के बाद चाँद दिखने पर मनाते हैं।



ईद का पर्व भाईचारे और सभी के साथ सौहार्द बनाये रखने वाला एक पावन पर्व है। ईद के मौके पर सभी धर्म के लोग अपने मुस्लिम भाइयों से गले मिलकर उनके घर आकर बधाई देते हैं।

ईद उल फित्र की नमाज सालभर में एक ही बार होती है तो सभी लोग ईदगाह पर जमा होकर बड़े शान्ति एवम् प्यार से नमाज अदा करते हैं। वहाँ न कोई अमीर होता है और न कोई गरीब होता है। सब मिल जुलकर साथ में नमाज अदा करते हैं। ईदगाह में नमाज इसलिए पढ़ी जाती है क्योंकि शहर के तमाम मुस्लिम भाई और आसपास के गाँव, कस्बे, देहात से काफी तादाद में मुस्लिम भाई नमाज पढ़ने के लिए जमा होते हैं। जिस कारण मस्जिद में जगह कम पड़ने (होने) के कारण ईदगाह में  नमाज़ अदा की जाती है। ईदगाह से मतलब किसी बड़ी जगह या खुली जगह से है। ईद की नमाज का समय सूर्योदय के  आधा घण्टे के बाद से ही शुरू हो जाता है जो दिन के 12 बजे तक ही रहता है। इसलिए हर शहर में मस्जिद कमेटी ईद की नमाज  का वक़्त दूरदराज से आने वालों को ध्यान में रखते हुए मुकर्रर करती है जिससे सभी लोग नमाज अदा कर सकें।  ईद की नमाज पढ़ने के लिए नमाजी(नमाज पढ़ने वाले) सुबह ही एक साफ कपड़ा बिछाने के लिए लेकर और नए कपड़े सिर पर टोपी पहने हुए अपने बच्चों और रिश्तेदारों के साथ निकल पड़ते हैं जिससे वे समय पर ईदगाह पहुँच कर नमाज अदा कर सकें।



ईद के दिन बच्चों में बड़ा उत्साह देखने को मिलता है। वे नए कपड़े पहनकर अपने रिश्तेदारों, पड़ोसियों, दोस्तो के घरों में सुबह तड़के ही खीर वगैरह बाँटने के लिए निकल पड़ते हैं और सभी लोग उनको ईदी के रूप में कुछ पैसे या तोहफे देते हैं। ईद के मौके पर नया कपड़ा पहनना जरूरी नहीं है। अगर किसी के पास नये कपड़े न हों तो वह पुराने मगर साफ धुले हुए  कपड़े पहनकर भी नमाज अदा कर ईद मना सकता है।



ईद उल फित्र में मुख्य रूप से जो पकवान बनते हैं वो खीर, शीरमाल, जर्दा, सिवईं आदि कुछ भी जो मीठा हो, बनाये जाते हैं। इसीलिए इस ईद को मीठी ईद भी कहते हैं।  लोग अपने  जो गरीब रिश्तेदार होते हैं, उनको जकात के रूप में पैसे देते हैं, ताकि वे भी ईद मना सकें और अपने बच्चों के लिए पकवान बना सकें। गरीबों को पैसे बाँटकर उनकी मदद की जाती है जिससे वे भी ईद मना सकें। घर में बनी खीर आदि को अपने रिश्तेदारों, गरीबों, अगल-बगल के पड़ोसी, दोस्तों आदि सभी को बाँटी जाती है।

बच्चे अपने नए-नए कपड़े पहने हुए बड़े खुश नजर आते हैं।

ईद  मिलन का एक त्योहार भी है जिसमें सभी अपने गिले शिकवे भुलाकर रूठे हुए भी एक साथ गले मिलकर ईद मनाते हैं। ईद भाईचारे का सन्देश भी देता है चाहे वह किसी भी धर्म को मानने वाला हो, उसको गले लगा कर ईद की बधाई देता और लेता है। इस ईद उल फित्र के मौके पर आप सभी को ढेर सारी बधाई एवं शुभकामनाएंँ। 💐💐💐💐💐


🙏 आलेख-:

सुहेब हुसैन(प्र०प्र०अ०) 

रा० उ० प्रा० वि० सेमलता ब्लाॅक- जखोली, रुद्रप्रयाग



🙏संकलन-: टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

होली - श्रीमती सुशीला थपलियाल

माँ तुम - श्रीमती वन्दना जोशी

गौचर मेला-श्री सरोज डिमरी