धरती माँ को दूषित न करें - श्रीमती भागीरथी पाण्डे जी

 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में पर्यावरण दिवस के सुअवसर पर प्रस्तुत है, आज जनपद- नैनीताल से शिक्षिका बहिन श्रीमती भागीरथी पाण्डे जी द्वारा रचित कविता-:


धरती मांँ को दूषित न करें

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धरती मांँ की गोद में खेले,

पले, बढ़े तुम हुए जवान।

खाकर अन्न जिस धरा माँ का,

पाकर पोषण बने बलवान।।


बदले में तुमने सोचो हे मानव!

उस माँ को क्या उपहार दिया।

कूड़ा-कचरा, गन्दगी, प्लास्टिक,

और जहर से आँचल पाट दिया।।


पेड़ों से पायी प्राणवायु तुमने,

फल, फूल, ईंधन और छाया,

अनुपम सौंदर्य और हरियाली,

सब सुख जीवन का तुमने पाया।।



उन्हीं जीवनदाता पेड़ों को,

विकास का नाम दे काट डाला।

धन के लालच में पड़कर तुमने,

पालनहार को ही बेच डाला।।


जिन स्रोतों का शीतल मधुर जल,

अमृत बन रगों में दौड़ रहा।

जिन पावन नदियों के तटों पर,

प्रभु ने भक्तों हित अवतार लिया।।


उन्हीं जलस्रोतों और नदियों को,

तुमने प्रतिपल प्रदूषित किया।

कुओं, तालाबों को सुखा दिया,

नदियों में रसायन घोल दिया।।



नदी, जंगल, जमीन पर ही,

थमा नहीं तुम्हारा कहर।

रत्नाकर के भण्डार को भी,

रुके नहीं तुम प्रदूषित कर।।


पर्यावरण दिवस मनाने भर से,

नहीं निकलेगा इसका हल।

धरती मांँ की रक्षा के लिए,

करनी होगी नित सबको पहल।।


🙏 रचना-:

भागीरथी पाण्डे (प्र०अ०) 

रा० प्रा० वि० परमा 

ब्लाॅक- हल्द्वानी, नैनीताल



🙏संकलन :- टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड

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