मेरी चाहत - डाॅ० आशा विष्ट जी

 प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में  प्रस्तुत है आज जनपद-नैनीताल से शिक्षिका बहिन डा॓० आशा विष्ट जी की रचना:-


📝मेरी चाहत


बच्चे मेरे दिल के टुकड़े,

बच्चे मेरी शान।

बच्चों से ही मिल पाया,

मुझे बहुत बड़ा सम्मान।।


बच्चों से ही मेरी रोटी,

बच्चों से ही मेरा पानी।

बच्चों पर ही मेरा जीवन,

टिका हुआ है आजीवन।।


बच्चे अगर पूछें मुझसे,

मुझको क्या अच्छा लगता है?

मैं तो बस यही कहूॅंगी,

जो तुमको अच्छा लगता है।।



मन-मस्तिष्क तो बन जाऊँ कहता,

एक सुन्दर सी छोटी कविता‌‌।

जिसको तुम जीवन भर गाओ,

उतरे मन में ऐसी कविता।।


और सुनो तो यह भी चाहती,

बना पाऊँ एक सुन्दर कहानी‌।

अच्छे बुरे सभी को सुहाती,

हो जाये थोड़ी सी हैरानी।।


चाहत तो यह भी है मेरी,

फिर से बन जाऊँ बच्ची।

फिर से सीखूॅं अच्छी बातें,

बन जाऊँ सबकी सच्ची।।


चाहत है मेरी, नन्हे बच्चे,

पढ़-लिखकर बनें सब अच्छे।

जो मैं करने से रही वञ्चित,

उसको बच्चे करेंगे सञ्चित।।


देश का गौरव मान बढ़ेगा,

मस्तक मेरे भी सम्मान चढ़ेगा।

बने मेरा देश महान,

यही मेरी कल्पना उड़ान ।।


🙏रचना-:


डॉ० आशा बिष्ट (प्र०अ०)

रा० प्रा० वि० धुलई 

वि० ख० - भीमताल, नैनीताल



🙏संकलन :-टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड

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