पर्वत राज हिमालय- श्रीमती माधुरी नैथानी
📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में हिमालय दिवस पर प्रस्तुत है आज जनपद- पौड़ी से शिक्षिका बहन श्रीमती माधुरी नैथानी जी का लेख-:
पर्वत राज हिमालय
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पर्वतराज हिमालय हमारे भारतवर्ष का मुकुट है। सदा हिमाच्छादित रहने के कारण यह 'हिमालय' नाम को सार्थक करता है।
हिम+आलय अर्थात बर्फ का घर।
हिमालय देवात्मा की उपाधि से सुशोभित किया जाता है। अध्यात्म विज्ञानियों की दृष्टि में दैवीय चेतना सत्ता की, हिमालय निवास स्थली है।
हिमालय की चारों दिशाओं में अपार प्राकृतिक सौन्दर्य व्याप्त है। अनेक प्रकार के छोटे-छोटे, भाँति-भांँति के सुन्दर पुष्प, लता और मन्द-मन्द बहने वाली शुद्ध सुगन्धित वायु वातावरण को पवित्र करती हिम मण्डित ऊंँची चोटियांँ सदानीरा पवित्र सरिताएंँ कल-कल करते झरने अपनी संगीतमय तान से मानव को निमन्त्रण देते हुए प्रतीत होते हैं।
हिमालय के पशु-पक्षी, तालाब, झील, नदियांँ हिमालय के सौन्दर्य को बढ़ाते हैं। हिमालय, साहित्य सृजन, काव्य रचना, दृढ़ता, साहस, सौन्दर्य, शान्ति और धर्म एवं संस्कृति का प्रतिरूप है।
हिमालय के वैभव से अभिभूत ऋषि-मुनि, कवि, साहित्यकारों ने प्राचीन काल से लेकर वर्तमान समय तक बहुत कुछ लिखा है। संस्कृत साहित्य के श्रेष्ठ कवि कालिदास ने कुमार सम्भव में आज अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा और हिन्दी के प्रसिद्ध कवि सोहन लाल द्विवेदी हिमालय की भव्यता और उच्चता को इस प्रकार प्रस्तुत किया है - 'ऊंचा खड़ा हिमालय आकाश चूमता है'।
गद्य से लेकर काव्य जगत और संस्कृत साहित्य में कालिदास, सोहनलाल द्विवेदी, गोपाल सिंह नेपाली, नागार्जुन, धर्मवीर भारती, रामनरेश त्रिपाठी, रामधारी सिंह दिनकर, राहुल सांकृत्यायन जैसी महान विभूतियांँ ने हिमालय के चिरंजीवी होने का आशीष दिया और अनेक कवियों के काव्य भाव का विभूषित कर उनकी लेखनी को धन्य किया। हमारे भारत का प्रहरी होने के साथ-साथ भारत की सभ्यता संस्कृति सुख- समृद्धि और भारत के अस्तित्व का प्रतीक है
'हिमालय और हम' नामक कविता में कवि गोपाल सिंह नेपाली कहते हैं -
जैसा यह अटल अविचल,
वैसे ही है भारतवासी है।
अमर हिमालय धरती पर तो,
भारत वासी अविनाशी।।
प्रसाद साहित्य पर भी हिमालय की असीम कृपा रही है। हिमगिरि के उत्तुंग शिखर से लेकर हिमाद्रि-तुंग-श्रृंग तक प्रसाद ने हिमालय को काव्यात्मक अभिव्यक्ति में समाहित किया है।
हिमालय पर लेखन, हिमालय अध्ययन और हिमालय दर्शन क्षितिज का वह हिस्सा है जहांँ तक पहुंँचने में सबकी आस अधूरी है । हिमालय विराट वैभव सौन्दर्य व प्राकृतिक सम्पदा का धनी है और हमारा भारत वर्ष उनकी स्नेह आशीष छाया में है। कविवर जयशंकर प्रसाद जी के शब्दों में-
हिमालय के आंँगन में,
उसे प्रथम किरणों का दे उपहार।
उषा ने अभिनन्दन किया,
और पहनाया हीरक हार।।
🙏संकलन- टीम हिम मन मन्थन उत्तराखण्ड

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