धनतेरस-श्री मनोज कुमार घिल्ड़ियाल

 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में धन्वन्तरि पावन जयन्ती पर प्रस्तुत है आज जनपद-पौड़ी गढ़वाल से शिक्षिका बहन श्री मनोज घिल्ड़ियाल  जी द्वारा रचित कविता -:


🙏🕉️🔯📝धनतेरस 


एक बार देव-दानव जब,

समुद्र मन्थन कर रहे थे।

रत्नाकर से भाॅंति-भाॅंति के

तब रत्न निकल रहे थे।।


त्रयोदशी तिथि कार्तिक मास था,

धनवन्तरि भगवान का प्राकट्य हुआ था।

माॅं लक्ष्मी संग अमृतकलश लिया था,

देवों को पयपान करा अमर किया था।।



तभी से भगवान धन्वन्तरि जयन्ती,

धनतेरस के रूप में मनाते हैं।

अमृत कलश के प्रतीक रूप में,

चाॅंदी के सिक्के, बर्तन खरीदे जाते हैं।।



सुख, स्वास्थ्य की भावना से,

आरोग्य देव का पूजन करते हैं। 

धन-धान्य की कामना से,

माता लक्ष्मी का अर्चन करते हैं।।


🙏रचना-:


मनोज घिल्डियाल (प्र०अ०)

रा० प्रा० वि० कलीगाड़

वि० ख०- रिखणीखाल, पौड़ी गढ़वाल



🙏संकलन- टीम हिम मन मन्थन उत्तराखण्ड

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