मातृभाषा - डाॅ० गीता नौटियाल जी

 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में अन्तरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के सुअवसर पर प्रस्तुत है आज जनपद- रुद्रप्रयाग से शिक्षिका बहन डाॅ० गीता नौटियाल जी द्वारा रचित कविता:-


🙏📝मातृभाषा 


रोया-रोया, सिसकियाँ ही सिसकियाँ,

माँ की गोद पायी मिल गया था खजाना।

दुनिया की भाग-दौड़, हरमन बेचैनी से,

तार-तार बेचैनी बसी थी अन्तःस्थल के पार।। 



लम्बे वक्त तक अपनों से था दूर,

अपनी भाषा बोलने में शर्माता बार-बार।

मांँ मिली, मन अभी भी था भारी,

अपनी विपदा न सुना सका, यह थी लाचारी।। 



मातृ भाषा बिना समझा न सका माँ को, 

मिली जो बचपन में  अब न लौटा सका उसको।

मातृ भाषा और शर्म असह्य वेदना यह समझा, 

संबल जो मानव का विपत्ति का जब साया।। 




आज ही नहीं, पहले भी ऐसा हुआ कभी, 

गढ़वाली भाई ने नाम-पता पूछा जब कभी। 

अभागा था पहचान न बना सका अपनी, 

सच्चा होकर झूठा दुगला बना होकर खानदानी।। 


बहुत पछताया, रोया, क्या करूँ न समझ पाया, 

 अचेत, शान्त, अवाक् सा था वहीं पड़ा।

अविरल बहते अश्रु ! देखा माँ पोंछती,

 बचपन की प्यारी यादें मुझे सताती।। 


माँ की प्यारी ममता, पिता का दुलार,

अपनी भाषा, भाई-बहिनों की याद। 

वाद्य-यन्त्रों की तालें, हास्य प्रसंग व पहेलियाँ, 

पाण्डवाणी, जागर, झुमैला, चौंफला गीतों में अपनी भाषा।। 


अब समझ जाओ राज,

अपनी भाषा, मातृभाषा का, 

मन की आवाज साथ रखेंगे यदि इसे, होंगे शुभ्र हिमालय से विख्यात।। 


🙏रचना-:

डाॅ० गीता नौटियाल( अ० प्रा० शिक्षिका) 

ग्राम- बैनोली, ब्लाॅक-जखोली 

जनपद- रुद्रप्रयाग

🙏संकलन- टीम हिम मन मन्थन उत्तराखण्ड

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