राष्ट्रीय विज्ञान दिवस विशेषांक - श्री हेमन्त कुमार चौकियाल

 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में  राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के सुअवसर पर प्रस्तुत है आज जनपद- रुद्रप्रयाग से शिक्षक साथी श्री हेमन्त कुमार चौकियाल जी का जी का शिक्षाप्रद लेख:-

*राष्ट्रीय विज्ञान दिवस विशेषांक*

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*🙏📝"मन में उठे एक प्रश्न ने बनाया रमन को" सर रमन"*

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क्या आप जानते हैं कि किसी भी, वस्तु, घटना को देखकर आपके मन में जो प्रश्न उठता है वह एक बहुत बड़े आविष्कार का बीज है।

यदि इसी प्रश्न रूपी विचार पर आप जल्दी से जल्दी काम शुरू करते हैं तो इस प्रश्न रूपी विचार के जिन्दा रहने के मौके बहुत बढ़ जाते हैं। लगातार इस विचार रूपी प्रश्न पर सोचते रहने और कार्य रूप में परिणित करने पर एक दिन इसका फल एक बड़े आविष्कार के रूप में दुनिया के सामने आता है।

दुनिया में आज तक जितने भी बड़े आविष्कार हुए हैं, उनके मूल में एक क्यों? कैसे? वाला प्रश्न ही था।

हम सबके जेहन में हर दिन, हर पल, हर क्षण ऐसे प्रश्न उठते हैं। कुछ प्रश्नों पर कुछ देर हम विचार करते हैं तो वे थोड़ी देर


हमारे जेहन में जिन्दा रहते हैं। कुछ प्रश्नों पर हम ज्यादा जोर या ध्यान नहीं देते हैं तो उन्हें हम जल्दी भूल जाते हैं। कुल मिलाकर रहस्य वाली बात ये है कि प्रश्न के रूप में उठने वाले विचार पर हम जितनी जल्दी, जितनी गहराई, जितने देर तक विचार करते हैं तो वह प्रश्न उतना ही महत्वपूर्ण बन जाता है। यदि मन में उठने वाले इस प्रश्न पर विचार करके हम कार्य रूप में परिणित करने के लिए तत्पर होते हैं तो उस विचार के उतना ही जिंदा रहने के अवसर बढ़ जाते हैं। ऐसे ही सागर का जल इतना  नीला क्यों दिखाई देता है? प्रश्न ने रमन को नोबेल पुरस्कार विजेता "सर रमन" बना दिया।



आज तक विश्व में जितनी भी बड़ी - छोटी खोजें हुई हैं उनके मूल में एक छोटा प्रश्न ही था। विचार आपके और हमारे सबके मन में उठते हैं। अन्तर सिर्फ यह है कि जो अपने विचार पर विचार करते हैं उनके विचार दुनिया में क्रान्ति लाते हैं। आपके और हमारे विचार जन्म तो लेते हैं परन्तु वो हमारी निष्क्रियता के कारण जन्म लेने के तुरन्त बाद ही मर जाते हैं। यदि आप अपने मन में उठने वाले  विचार को प्रश्न में ढालकर तुरन्त उस बारे में सोच-विचार करते हुए, उस विचार को कार्य रूप में परिणित कर लेते हैं तो गारण्टी है कि वह विचार एक नये शोध /आविष्कार को अवश्य जन्म देगा। याद रखिएगा कि विश्व के 99.99%विचार उनके जन्म लेते ही निष्क्रियता के कारण मर जाते हैं। अगर आप अपने मन में जन्म लेने वाले किसी विचार (उत्सुकता वाले प्रश्न) को बचाने में सफल हो गये तो यकीन मानिये आप भी भविष्य में वैज्ञानिक के रूप में जाने जायेंगे।

*डॉ० रमन का जीवन परिचय*-



चन्द्रशेखर वेंकट रमन का जन्म 07 नवम्बर सन 1888 को तमिलनाडु राज्य के तिरुचिरापल्ली जिले के छोटे से गाँव में हुआ था। इनकी माँ का नाम पार्वती अम्मल था। पिता चन्द्रशेखर अय्यर की गणना भौतिकी व गणित के विद्वत व श्रेष्ठ अध्यापकों में होती थी, यही कारण रहा कि चन्द्रशेखर का भी बचपन से क्या, क्यों और कैसे जैसे प्रश्नों से लगाव हो गया, जिन्होंने रमन को आम से खास बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 



*शिक्षा-दीक्षा*-प्रारम्भिक शिक्षा अपने ही गाँव व विशाखापत्तनम में हुई। रमन बचपन से ही होनहार थे तो मात्र ग्यारह वर्ष की उम्र में ही दसवीं की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर वे भारत के पहले ऐसे छात्र बने जिन्होंने इतनी कम उम्र में दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की हो। 

1901में उन्होंने इण्टरमीडिएट की परीक्षा पास करके चेन्नई के प्रेसीडेंसी कॉलेज में 13 वर्ष की उम्र में प्रवेश लिया। 1904में बी०ए० की परीक्षा (तब ऐसा नियम था कि आप बी०ए० में विज्ञान अथवा कला अथवा वाणिज्य वर्ग के कोई भी दो विषय पढ़ सकते थे) भौतिकी तथा अंग्रेजी विषय के साथ स्वर्ण पदक विजेता बनकर स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की। 



सन् 1904 में स्नातक (बी.ए.) की उपाधि अर्जित करने के बाद उन्होंने आगे उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए विदेश जाने का निर्णय किया। मगर वेंकटरमन के स्वास्थ्य से सम्बन्धित परीक्षण के बाद एक ब्रिटिश चिकित्सक ने उनकी दुर्बलता को देखते हुए विदेश न जाने की सलाह दी। इसलिए वे उच्च शिक्षा के लिए विदेश न जा सके और उन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज में ही दाखिला लिया।  सन् 1907 में भौतिकी में परास्नातक (एम.ए.) की उपाधि प्राप्त की। स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद वे अखिल भारतीय एकाउंट्स सेवा प्रतियोगिता परीक्षा में बैठे और उसमें भी प्रथम स्थान प्राप्त किया। मात्र 19 वर्ष की आयु में ही उनकी नियुक्ति सहायक एकाउण्टेण्ट जनरल के पद पर वित्त विभाग, कलकत्ता के पद पर हो गई। इसी वर्ष नियुक्ति से पहले ही उनका विवाह श्रीकृष्ण अय्यर जी की योग्य कन्या लोकसुन्दरी अम्मल से हो गया।

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*सेवा और विज्ञान के बीच के अन्तर्द्वन्द का समय*

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वेंकटरमन जी के वित्त विभाग में सहायक एकाउण्ट जनरल बन जाने के बाद भी वे नौकरी से सन्तुष्ट नहीं हो पाये। उनका मन भौतिकी की अद्भुत् दुनिया में ही रमने को आतुर होता था। वित्त विभाग की रौबदार नौकरी के बाद भी उनकी रूचि भौतिकी में  ही बनी रही। कहते हैं जहाँ चाह वहाँ राह। जिस चीज को आप शिद्दत से पाना चाहते हैं, उसे पाने के लिए सारी कायनात भी आपकी मदद करती है। संयोग से एक दिन वेंकटरमन कार्यालय से घर लौट रहे थे तभी उन्होनें एक संस्था का साइन बोर्ड देखा, जिस पर लिखा था- ‘द इंडियन एसोसिएशन फॉर कल्टीवेशन आफ साइंस’।  वे ट्राम से उतरकर सीधे उस संस्था में जा पहुँचे। उस संस्था के स्थापक श्री महेंद्र लाल सरकार जी थे और उसकी देखरेख आशुतोष डे करते थे। पहली ही मुलाकात में संस्था के सचिव अमृत लाल जी ने वेंकटरमन की वैज्ञानिक प्रतिभा को पहचान लिया और भारतीय विज्ञान को प्रोत्साहित करने वाली इस संस्था में उनका स्वागत किया। अमृत लाल जी ने रमन जी को प्रयोगशाला में कार्य करने की अनुमति  दे दी। बहुत जल्द अपने रूचि के काम में तल्लीन होकर  वेंकटरमन ने इसी प्रयोगशाला में भौतिकी के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण शोध-कार्य किये।

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*विधि के विधान से मिला और एक अवसर*

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भौतिकी के क्षेत्र में वेंकटरमन के उच्च कोटि के कार्यो से प्रभावित होकर कलकत्ता विश्वविद्यालय के तत्कालीन उपकुलपति सर आशुतोष मुखर्जी ने उन्हें भौतिकी के अध्यापक के रूप में पढ़ाने का प्रस्ताव रखा। वेंकटरमन ने इस प्रस्ताव को तुरंत मंजूर कर लिया। अगले ही दिन लगी-लगाई वित्त विभाग में सरकारी नौकरी से त्याग पत्र दे दिया और विज्ञान की सेवा के लिए कलकत्ता विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य करने लगे। चूँकि यह कार्य विज्ञान से सम्बन्धित था, इसलिए उन्हें इस कार्य से अपार सन्तुष्टि मिली। उनकी पढ़ाने की शैली बहुत अच्छी थी। उनके मस्तिष्क में अद्भुत् चुस्ती थी। एक ओर जहाँ वे पूरी तन्मयता से विद्यार्थियों को पढ़ाते तो वहीं दूसरी ओर पूरी तन्मयता से वाद्ययंत्रों, क्रिस्टलों, एक्स-रे, प्रकाश, विद्युत चुम्बकत्व आदि पर महत्वपूर्ण अनुसन्धान कार्य करते रहते थे। उन्होंने अपनें प्रयोगों के लिए कई उपकरणों का निर्माण स्वयं किया और अनुसंधान के लिए विश्वविद्यालय में विज्ञानमय माहौल भी निर्मित किया।

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*ऐसे हुई रमन प्रभाव की खोज*

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 सन 1921 में  रमन को ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय, इंग्लैंड से विश्वविद्यालयीन कांग्रेस में भाग लेने के लिए निमंत्रण प्राप्त हुआ। निमन्त्रण पाते ही वे इस कांग्रेस में भाग लेने के लिए रवाना हुए। यहांँ उनकी मुलाकात इलेक्टॉन की खोज करने वाले वैज्ञानिक जे०जे० थॉमलन, लार्ड रदरफोर्ड जैसे विख्यात वैज्ञानिकों से भी हुई। जिनसे बातचीत कर रमन को कई नये नजरिए मिले। इसी कांग्रेस से भाग लेकर जब  वे वापस पानी के जहाज से वापस भारत लौट रहे थे, तो रास्ते-भर वे भूमध्यसागर के जल के रंग को ध्यानपूर्वक देखते रहे।  उन्हें सागर के नीले रंग को देखकर उसने  मस्तिष्क में कई प्रश्न उमड़ने-घुमड़ने लगे कि सागर का रंग नीला क्यों  दिखाई दे रहा है जबकि पानी का रंग रंगहीन होता है और अक्सर हम उसे सफेद कह लेते हैं? उन्होंने सोचा कि कहीं सागर आकाश के प्रतिबिम्ब के कारण तो नहीं नीला प्रतीत हो रहा है? समुद्री यात्रा के दौरान ही उसने सोचा कि शायद सूर्य का प्रकाश जब जल में प्रवेश करता है तो वह नीला हो जाता है। 

 रास्ते-भर वे सागर के नीले रंग और सूर्य के अन्तर्सम्बन्ध के बारे में सोचते रहे । 

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*सागर का रंग नीला क्यों? प्रश्न पर चिंतन रहा जारी*-

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भारत लौटकर रमन ने इस विषय पर गहन अध्ययन एवं शोध प्रारम्भ कर दिया। शोध के बाद प्राप्त निष्कर्षों को  एक शोधपत्र की शक्ल में प्रतिष्ठित पत्रिका ‘नेचर’ में प्रकाशन के लिए भेज दिया , जो ‘प्रकाश का आणविक विकिरण’ नामक शीर्षक से 1922 में प्रकाशित हुआ। 

कलकत्ता विश्वविद्यालय पहुँचकर वेंकटरमन ने अपने सहयोगी डॉ० के० एस० कृष्णन के साथ मिलकर जल तथा बर्फ के पारदर्शी प्रखण्डों (ब्लॉक्स) एवं अन्य पार्थिव वस्तुओं के ऊपर प्रकाश के प्रकीर्णन पर अनेक प्रयोग किए। तमाम प्रयोगों के बाद वेंकटरमन अपनी उस खोज पर पहुँचे, जो बाद में ‘रमन प्रभाव’ नाम से विश्वविख्यात हुई।

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*रमन प्रभाव से पहले सागर के नीले रंग के बारे में थी दूसरी धारणा*-

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रमन की इस खोज से पहले 

प्रसिद्ध वैज्ञानिक लार्ड रैले की मान्यता थी कि सूर्य की किरणें जब वायुमण्डल में उपस्थित नाइट्रोजन और ऑक्सीजन के अणुओं से टकराती हैं तो प्रकाश सभी दिशाओं में प्रसारित हो जाता है और आकाश का रंग नीला दिखाई देता है। इसे रैले के सम्मान में ‘रैले प्रकीर्णन’ के नाम से जाना जाता था। उस समय तक लार्ड रैले ने यह भी सिद्ध कर दिया था कि सागर का नीलापन आकाश के प्रतिबिम्ब के कारण है। उनके मतानुसार सागर का अपना कोई रंग नहीं होता।

 परन्तु रमन ने रैले की इस मान्यता को पूर्ण रूप से सन्तोषजनक नहीं माना। सागर के नीलेपन के वास्तविक कारण  जानने के लिए उन्होंने जहाज के डैक पर अपना उपकरण ‘स्पेक्ट्रोमीटर’ लगाया और इस प्रश्न की गुत्थी को सुलझाने के लिए प्रयोग पर प्रयोग करने में लग गए। आखिर में वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि सागर का नीलापन उसके भीतर ही है। और इसके नीलेपन का कारण आकाश के प्रतिबिम्ब के कारण नहीं, बल्कि जल के रंग के कारण है। इसका अभिप्राय यह था कि स्वयं सागर का रंग नीला है एवं यह नीलापन पानी के अन्दर से ही उत्पन्न होता है।

बाद में वे इस निष्कर्ष तक पहुँचे कि पानी के अणुओं (मॉलिक्यूल्स) द्वारा प्रकाश के प्रकीर्णन के फलस्वरूप सागर एवं हिमनदियों का रंग नीला दिखाई देता है। सामान्यत:आकाश का रंग नीला इसलिए दिखाई देता है क्योंकि सूर्य के प्रकाश में उपस्थित नीले रंग के प्रकाश की तरंग-लंबाई यानी ‘वेवलेंथ’ का प्रकाश अधिक प्रकीर्ण होता है। दरअसल, किसी रंग का प्रकीर्णन उसकी तरंग-लंबाई पर निर्भर करता है। जिस रंग के प्रकाश की तरंग-लम्बाई सबसे कम होती है, उस रंग का प्रकीर्णन सबसे ज्यादा होता है तथा जिस रंग के प्रकाश की तरंग-लम्बाई सबसे ज्यादा होती है, उस रंग का प्रकीर्णन सबसे कम होता है। लाल रंग के प्रकाश का प्रकीर्णन सबसे कम होता है, जबकि बैंगनी रंग का प्रकाश सर्वाधिक प्रकीर्ण होता है। आप सोच रहे होंगें कि इस हिसाब से तो आकाश का रंग बैंगनी दिखाई देना चाहिए, फिर यह नीला क्यों दिखाई देता है? दरअसल हमारी आँखें बैंगनी रंग की अपेक्षा नीले रंग के लिए अधिक सुग्राही होती हैं। इसलिए प्रकीर्णित प्रकाश का मिलाजुला रंग हल्का नीला प्रतीत होता है।

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*क्या है रमन प्रभाव*

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 रमन प्रभाव के अनुसार जब एक-तरंगीय प्रकाश (एक ही आवृत्ति का प्रकाश) को विभिन्न रसायनिक द्रवों से गुजारा जाता है, तब प्रकाश के एक सूक्ष्म भाग की तरंग-लंबाई मूल प्रकाश के तरंग-लंबाई से भिन्न होती है। तरंग-लम्बाई में यह भिन्नता ऊर्जा के आदान-प्रदान के कारण होता है। जब ऊर्जा में कमी होती है तब तरंग-लम्बाई अधिक हो जाता है तथा जब ऊर्जा में बढ़ोत्तरी होती है तब तरंग-लम्बाई कम हो जाता है। यह ऊर्जा सदैव एक निश्चित मात्रा में कम-अधिक होती रहती है और इसी कारण तरंग-लम्बाई में भी परिवर्तन सदैव निश्चित मात्रा में होता है। दरअसल, प्रकाश की किरणें असंख्य सूक्ष्म कणों से मिलकर बनी होती हैं, इन कणों को वैज्ञानिक ‘फोटोन’ कहते हैं।  प्रकाश की दोहरी प्रकृति  होती है कि वह तरंगों की तरह भी व्यवहार करता है और कणों (फोटोनों) की भी तरह। रमन प्रभाव ने फोटोनों के ऊर्जा की आन्तरिक परमाण्विक संरचना को समझने में विशेष सहायता प्रदान की। किसी भी पारदर्शी द्रव में एक ही आवृत्ति वाले प्रकाश को गुजारकर ‘रमन स्पेक्ट्रम’ प्राप्त किया जा सकता है। प्रत्येक पारदर्शी द्रव को स्पेक्ट्रोग्राफ में प्रवेशित करने के बाद वैज्ञानिकों को यह पता चला कि किसी भी द्रव का रमन स्पेक्ट्रम विशिष्ट होता है, यानी किसी अन्य द्रव का स्पेक्ट्रम किसी भी दूसरे द्रव जैसा नहीं होता है। इसके जरिये हम किसी भी पदार्थ की आन्तरिक संरचना के बारे में भी जान सकते हैं। उन दिनों भौतिकी में यह एक विस्मयकारी खोज थी। वेंकटरमन की इस खोज से क्वाण्टम भौतिकी के क्षेत्र में भी अत्यन्त क्रान्तिकारी परिवर्तन आया। रमन प्रभाव उस समय की एक बहुत बड़ी तथा क्रान्तिकारी खोज थी जो बाद में कई अन्य भौतिक और रासायनिक खोजों का आधार बनी। 

वेंकटरमन ने 28 फरवरी, 1928 को रमन प्रभाव के खोज की आम घोषणा की थी। इसलिए इस महत्वपूर्ण खोज की याद में प्रत्येक वर्ष यह दिन ‘राष्ट्रीय विज्ञान दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। 

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*सम्मान और पुरस्कारों के साथ नोबेल पुरस्कार*-

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 वेंकटरमन की  इस खोज को न केवल देश में ही वरन विदेशों में भी खूब सराहा गया। देश सहित विदेशों ने उन्हें कई तरह के पुरस्कारों से सम्मानित  किया गया। सन् 1929 में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें ‘सर’ की उपाधि से विभूषित किया, जो उस समय बहुत बड़ा सम्मान समझा जाता था। सन् 1930 में  भौतिकी का नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाले वे पहले एशियाई और अश्वेत वैज्ञानिक थे। सन 1952 में उनके पास भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति बनने का निमन्त्रण आया। इस पद के लिए सभी राजनीतिक पार्टियों ने उनके नाम का ही समर्थन किया था। इसलिए वेंकटरमन को निर्विवाद उपराष्ट्रपति चुना जाना पूर्णतः निश्चित था, परन्तु वेंकटरमन में तनिक भी पद-लोलुपता नहीं थी और साथ-ही-साथ उनकी राजनीति में जरा भी दिलचस्पी नहीं थी। इसलिए उन्होंने उपराष्ट्रपति बनने के निमन्त्रण को अस्वीकार कर दिया।========================

*मिला भारत रत्न सम्मान*-

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सन् 1954 में भारत सरकार ने उन्हें अपने सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ से भी विभूषित किया। गौरतलब है कि वेंकटरमन पहले ऐसे भारतीय वैज्ञानिक थे जिन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया था। 

भारत में रहकर वेंकटरमन आजीवन शोधकार्यों में लगे रहे। उन्होंने बैंगलुरू में रमन रिसर्च इन्स्ट्यूट की स्थापना की। 

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*निधन*-

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21 नवम्बर, 1970 को 82 वर्ष की आयु में भारत में वैज्ञानिक अनुसन्धान करके गौरवान्वित करनेवाले सर चंद्रशेखर वेंकटरमन का निधन हो गया।


सन्दर्भ-

1-लि०यू०वि० विज्ञान क्लब। 

2-NCTS


आलेख-:

हेमन्त चौकियाल (स०अ०) 

रा० उ० प्रा० वि० डाँगी गुनाऊँ 

वि० ख०- अगस्त्यमुनि

जनपद- रुद्रप्रयाग, उत्तराखण्ड 

Mail-hemant.chaukiyal@gmail.com


🙏संकलन- टीम हिम मन मन्थन उत्तराखण्ड

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