सृष्टि का आधार- नारी - सुश्री विजयलक्ष्मी
📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत है आज जनपद- नैनीताल से शिक्षिका बहन सुश्री विजयलक्ष्मी जी द्वारा रचित कविता:-
*🙏📝सृष्टि का आधार-नारी*
सृष्टि की आदि हूँ मैं,
सृष्टि की आधार हूँ मैं।
जन्मदात्री पालन कर्ता,
सृष्टि की पतवार हूँ मैं।।
अम्बा,अम्बिका, जगदम्बा हूँ मैं,
दुर्गा, काली, कपाली, कराली हूँ मैं।
चण्डिका, भवानी, कल्याणी हूँ मैं,
सृष्टि के कण-कण में बसी उजास हूँ मैं।।
सांय की उषा, भोर की प्रभात हूँ मैं,
महालक्ष्मी, धन-धान्य का भण्डार हूँ मैं।
सरस्वती ज्ञान की अनन्त पारावार हूँ मैं,
समस्त विद्याओं का आधार और सार हूँ मैं।।
समस्त सिद्धियों की स्वरूपा हूँ मैं,
शौर्य की जननी पराक्रम स्वरूपा हूँ मैं।
समस्त बल की अधिष्ठात्री परम पुरुष स्वरूपा हूंँ मैं,
माँ, बहन, पुत्री बन सृष्टि को चलाती हूँ मैं।।
सारे रिश्ते-नाते ही बनाती हूँ मैं,
पिता का आह्लाद माँ की मुस्कान हूँ मैं।
कन्या भोज और पुण्य मान हूँ मैं,
कल्पना चावला, प्रतिभा, द्रौपदी हूँ मैं।।
सीता, सावित्री,अहिल्या, लक्ष्मीबाई हूँ मैं,
होली, दीवाली, तीज, रक्षाबन्धन की बहार हूँ मैं।
त्योहारों की खुशी और आधार हूँ मैं,
पुष्पों में बसी महकती पराग हूँ मैं।।
हिम की शीतलता, वन की आग हूँ मैं,
सागर की तरंग, नदियों की कल-कल हूँ मैं।
अमावस की क्षय पूर्णिमा की कलाएँ मैं हूँ,
वृक्षों के झुरमुट में लहलहाती लताएँ हूँ मैं।।
नभ की अनन्तता, वसुधा की धैर्य, शीलता हूँ मैं,
आकाश का शब्द, चपला की चपलता हूँ मैं।
सृष्टि में गति और अवरोध हूँ मैं,
संसार का संयोग और वियोग हूँ मैं।।
मैं सत्य हूँ, शिव हूँ, सुन्दर हूँ,
मैं चिदानन्द, अविनाशी, सनातन हूँ।
सम्पूर्ण जगत के जीवों की आत्मा हूँ मैं,
सभी की आत्मा में समाहित परमात्मा हूँ मैं।।
🙏रचना:-
विजयलक्ष्मी (प्र०अ०)
रा० प्रा० वि० चन्द्रनगर
वि० ख०- रामनगर, नैनीताल
🙏संकलन- टीम हिम मन मन्थन उत्तराखण्ड

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