बैशाख पूर्णिमा - महात्मा गौतम बुद्ध जयन्ती
📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में बैशाख पूर्णिमा पावन पर्व पर प्रस्तुत है महात्मा बुद्ध और बैशाखी पूर्णमासी पर विशेष संकलित लेख :-
बैशाख पूर्णिमा एवं महात्मा गौतम बुद्ध जयन्ती
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आज 5 मई को बैशाख शुक्ल पूर्णिमा तिथि है। हिंदू धर्म में इस तिथि को बुद्ध पूर्णिमा कहा गया है क्योंकि 563 ई०पू० में इस दिन महात्मा बुद्ध का जन्म हुआ था। ई०पू०531 में बोध गया में निरंजना नदी के तट पर महात्मा बुद्ध को पीपल के वृक्ष के नीचे बोधि यानी ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। इसके अलावा ई०पू० 483 में इसी तिथि को महात्मा बुद्ध का महापरिनिर्वाण भी हुआ था यानी इन्होंने देह त्याग किया था। महात्मा बुद्ध के जीवन की ये तीनों बड़ी घटनाएँ बैशाख पूर्णिमा को होने की वजह से बौद्ध धर्म में इस दिन का विशेष महत्व है।
हिन्दू धर्म को मानने वाले भी इस दिन को बहुत ही पवित्र और शुभ मानते हैं क्योंकि शास्त्रों में भगवान विष्णु के 10 अवतारों का वर्णन मिलता है जिनमें 9वांँ अवतार बुद्ध को बताया गया है। इसलिए हिन्दू धर्म में इस दिन भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों की पूजा का विधान है।
बैशाख पूर्णिमा को श्रद्धालु गंगा स्नान करके दान पुण्य भी करते हैं। इसलिए इसे बैशाख स्नान का दिन भी कहा गया है। ऐसी मान्यता है कि इसदिन गंगा स्नान करने से कुम्भ में स्नान दान करने के समान पुण्य प्राप्त होता है। गंगा जी में स्नान करने जाना सम्भव न हो तो घर पर ही पानी में गंगा जल मिलाकर स्नान किया जा सकता है।
रामचरित मानस में कहा गया है कि कलियुग में दान और प्रभु का नाम ही मुक्ति का आधार है। यही कारण है कि सभी पुण्य तिथियों सहित बैशाख पूर्णिमा को भी दान और विष्णुसहस्रनाम पाठ करना बहुत ही पुण्यदायी माना गया है।
महात्मा गौतम बुद्ध बौद्ध धर्म के संस्थापक थे। उनका असली नाम सिद्धार्थ था। गौतम बुद्ध का जन्म नेपाल स्थित लुम्बिनी में 563 वीं ईसा पूर्व में एक राजपरिवार में हुआ था। जब कपिलवस्तु की महारानी महामाया देवी अपने नैहर देवदह जा रही थीं, तो रास्ते में लुम्बिनी वन में ही महात्मा बुद्ध (सिद्धार्थ) का जन्म हुआ।
उनके पिता का नाम शुद्धोदन था। जन्म के सात दिन बाद ही मांँ का देहान्त हो गया। सिद्धार्थ की मौसी गौतमी ने उनका लालन-पालन किया।
एक राजपरिवार में जन्म लेने के बाद भी उन्हें धन-वैभव अपने पास में न बाँध सका। संसार के बहुत से प्रश्नों पर विचार करते-करते उनका मन इनके सत्य की खोज करने के लिए आतुर हो उठा। विचारों के तूफान ने उन्हें गृहत्याग करने पर मजबूर कर दिया।
29 वर्ष की आयुु में सिद्धार्थ विवाहोपरान्त एक मात्र प्रथम नवजात शिशु राहुल और धर्मपत्नी यशोधरा को त्यागकर संसार को जरा, मरण, दुखों से मुक्ति दिलाने के मार्ग एवं सत्य दिव्य ज्ञान की खोज में रात्रि में राजपाठ का मोह त्यागकर वन की ओर चले गए। वर्षों की कठोर साधना के पश्चात बोध गया (बिहार) में बोधि वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई और वे सिद्धार्थ गौतम से भगवान बुद्ध बन गए।
गौतम बुद्ध ने अपने जीवन में हमेशा लोगों को अहिंसा और करुणा का भाव सिखाया। गौतम बुद्ध के अनमोल विचार आज भी लोगों को जीवन में सफल और आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।
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भगवान बुद्ध के 10 बड़े उपदेश
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भगवान बुद्ध समझदारी से जीवन जीने, स्वास्थ्य का ध्यान रखने, क्रोध न करने, आध्यात्मिक जीवन जीने और किसी भी तरह की हिंसा न करने तथा जीवन में त्याग को अपनाने की सीख देते हैं।
भगवान बुद्ध के 10 खास उपदेश हैं -
1-दूसरों का बुरा न करें- अपनी प्राण-रक्षा के लिए भी जान-बूझकर किसी प्राणी का वध न करें। जहांँ मन हिंसा से मुड़ता है, वहांँ दुःख अवश्य ही शान्त हो जाता है।
2-सत्य के बारे में- उन्होंने कहा है कि तीन चीजें ज्यादा देर तक छुपी नहीं रह सकतीं, वे हैं- सूर्य, चन्द्रमा और सत्य। जिस तरह सूर्य रोज प्रत्यक्ष दिखाई देता है, चन्द्रमा भी दिखाई देता है उसी तरह सत्य कभी न कभी सामने आ ही जाता है। अत: असत्य को अपने आचरण में ना उतारें, उससे दूर रहने में ही मनुष्य की भलाई है।
3-जीवन का उद्देश्य सही रखें- जीवन में किसी उद्देश्य या लक्ष्य तक पहुंचने से ज्यादा महत्वपूर्ण उस यात्रा को अच्छे से सम्पन्न करना होता है।
4-प्रेम का मार्ग अपनाएंँ- बुराई से बुराई कभी खत्म नहीं होती। घृणा को तो केवल प्रेम द्वारा ही समाप्त किया जा सकता है, यह एक अटूट सत्य है।
5- खुद जैसा औरों को समझना- जैसे मैं हूॅं, वैसे ही वे हैं, और 'जैसे वे हैं, वैसा ही मैं हूॅं। इस प्रकार सबको अपने जैसा समझकर न किसी को मारें, न मारने को प्रेरित करें।
6. स्वयं पर विजय- जीवन में हजारों लड़ाइयांँ जीतने से अच्छा है कि तुम स्वयं पर विजय प्राप्त कर लो। फिर जीत हमेशा तुम्हारी होगी, इसे तुमसे कोई नहीं छीन सकता।
7- दूसरों को सुख दें- मनुष्य यह विचार किया करता है कि मुझे जीने की इच्छा है मरने की नहीं, सुख की इच्छा है दुख की नहीं। यदि मैं अपनी ही तरह सुख की इच्छा करने वाले प्राणी को मार डालूंँ तो क्या यह बात उसे अच्छी लगेगी? इसलिए मनुष्य को प्राणीघात से स्वयं तो विरत हो ही जाना चाहिए। उसे दूसरों को भी हिंसा से विरत कराने का प्रयत्न करना चाहिए।
8- बैर-भाव न रखें- बैरियों के प्रति बैररहित होकर, अहा! हम कैसा आनन्दमय जीवन बिता रहे हैं, बैरी मनुष्यों के बीच अबैरी होकर विहार कर रहे हैं!
9-पशु हिंसा से बचें- पहले तीन ही रोग थे- इच्छा, क्षुधा और बुढ़ापा। पशु हिंसा के बढ़ते-बढ़ते वे अठ्ठानबे हो गए। ये याजक, ये पुरोहित, निर्दोष पशुओं का वध कराते हैं, धर्म का ध्वंस करते हैं। यज्ञ के नाम पर की गई यह पशु-हिंसा निश्चय ही निन्दित और नीच कर्म है। प्राचीन पण्डितों ने ऐसे याजकों की निंदा की है।
10-चर्म धारण न करें- भगवान् बोले- 'भिक्षुओं! महाचर्मों को, सिंह, बाघ और चीते के चर्म को नहीं धारण करना चाहिए। जो धारण करे, उसे दुक्कट (दुष्कृत) का दोष होता है।'
🙏संकलन-: माधव सिंह नेगी(प्र०अ०)
रा० प्रा० वि० जैली,
ब्लाॅक- जखोली, जनपद-रुद्रप्रयाग
🙏संकलन- टीम हिम मन मन्थन उत्तराखण्ड.

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