श्रमिक- श्रीमती सन्नू नेगी

 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में  प्रस्तुत है आज जनपद- चमोली गढ़वाल से शिक्षिका बहन श्रीमती  सन्नू नेगी जी द्वारा रचित कविता:-


🙏📝श्रमिक

जाड़ा गर्मी बरसात सहता, 

नहीं किसी से कुछ कहता।। 


कर्तव्य पथ का राही वह तो

पेट के खातिर चलता रहता।

कोई गांँव में कोई शहर  में, 

मीलों चलता दोपहर में।। 


काम के खातिर रहता, 

नहीं किसी से कुछ कहता।।


तन पहनने को वसन नहीं, 

ना सिर ढकने को झोपड़ी।

पैरों में कई छाले पड़े, 

कर्ज में डूबी है खोपड़ी।। 



पैसों का नित अभाव रहता, 

नहीं किसी से कुछ कहता।। 



खून पसीना श्रम बेचता, 

और बेचता है जवानी।

नहीं किसी को दया आती, 

चाहे उसकी मर जाए नानी।।

 

रक्त भले ही जिस्म से बहता, 

नहीं किसी से कुछ कहता।। 


धरती का वह सीना चीरे, 

चट्टानों के सिर वह फोड़े।

वही फसल उपजाता है, 

रुख दरिया के भी मोड़े।। 


दुख दर्द स्वयं ही सहता, 

नहीं किसी से कुछ कहता।। 


नहीं कोई उसको बहलाता, 

सिर भी कोई नहीं सहलाता।

अपनी पीड़ा खुद ही सहता, 

 वही तो श्रमिक है कहलाता।। 


आँख में आँसू बहता रहता, 

नहीं किसी से कुछ कहता।। 


केवल होता है नित शोषण, 

कभी न होता पूर्ण पोषण।

खाली घर खाली जीवन, 

पीड़ित बच्चे सभी कुपोषण।। 


बस ताउम्र यूँ ही रहता, 

नहीं किसी से कुछ कहता।। 



🙏रचना-:


सन्नू नेगी(स०अ०)

रा० क० उ० प्रा० वि० सिदोली

विकास खण्ड-  कर्णप्रयाग, चमोली


🙏संकलन- टीम हिम मन मन्थन उत्तराखण्ड

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