कुदरत का कहर-श्रीमती उषा सागर
📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में प्रस्तुत है आज जनपद- पौड़ी गढ़वाल से शिक्षिका बहन श्रीमती उषा सागर जी द्वारा रचित कविता:-
📝 कुदरत का कहर
आसमान से आफत बरसी,
जख्मी धरती लहूलुहान है।
देख ऐसा भयानक मंजर,
हर कोई हुआ परेशान है।।
फटा कहीं पर बादल है,
कहीं बनी है बिजली आफत।
कब तक रहेंगे ये हालात ऐसे?
जाने कब मिलेगी राहत?
मानव, जीव-जन्तु, पशु-पक्षी,
पेड़ और पौधे सभी हैं व्याकुल।
नींद मौत की सुला कितनों को,
कितने ही घर हैं शोकाकुल।।
नदी-नाले सब भरे हुए हैं,
भरी जवानी उन्मत्त हुए हैं।
टूटते पहाड़ और पत्थरों से,
सौ-सौ वृक्ष खत्म हुए हैं।।
हानि हुई जन-धन की भारी,
नष्ट हो रही वन सम्पदा हमारी।
आगे न जाने क्या कर बैठो!
ठीक नहीं है मनसा तुम्हारी।।
तुम्हारे विराट स्वरूप से,
भयभीत हुए हैं सारे।
आये कोई गोपाल यहांँ भी,
हम भी आश्रय पा लें सारे।।
🙏 रचना-:
उषा सागर (स०अ०)
रा० उ० प्रा० वि० गुनियाल
वि० ख० जयहरीखाल
पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखण्ड
🙏संकलन- टीम हिम मन मन्थन उत्तराखण्ड

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