वाल्मीकि जयन्ती-श्रीमती सरोज डिमरी
📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में वाल्मीकि जयन्ती के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत है आज जनपद- चमोली, गढ़वाल से शिक्षिका बहन श्रीमती सरोज डिमरी जी द्वारा रचित कविता:-
🙏🕉️✍️वाल्मीकि जयन्ती
शरद पूर्णिमा को जन्मे थे,
रामायण की रचना की।
महान महाकाव्य को रचकर,
ऐतिहासिक धरोहर वृद्धि की।।
रत्नाकर था साहसी युवक,
प्रतिभा कोई पहचान ना पाया।
उम्र बढ़ी तब वही करते जो,
सामने और दिल में आया।।
परिवार का भरण पोषण,
करना था उनको स्वयं।
साधन पास नहीं था कुछ भी,
जिससे धन-पैसा आए स्वयं।।
ऐसे में क्रूर-मजबूर हुए वह,
करते थे अब लूट-पाट।
जो भी राहगीर जंगल से गुजरा,
सिखाते उसको अद्भुत पाठ।।
आना कानी जो करता था,
उसको देते थे कटु दण्ड।
इस प्रकार से उनका आचरण,
बना गया भारी उद्दण्ड।।
सत्यव्रती योगी जब मिलते,
देते हैं कुछ उत्तम ज्ञान।
उन साधुओं से रत्नाकर को,
महसूस हुआ सुखद अहसान।।
छोड़ डकैती मरा-मरा कह,
करने लगे राम-राम का जाप।
सद्गति, सद्बुद्धि ऐसी आई,
प्रभु-राम-कृपा मिले अपने आप।।
रत्नाकर से नाम बदलकर,
वाल्मीकि नाम हुआ परम।
रामायण की रचना कर दी,
आश्रय बनाया पुरुषोत्तम।।
राम नाम आधार बनाकर,
स्वयं का कराया था उद्धार।
राम नाम को जप करके,
उतर गये भवसागर पार।।
कविता शाखा पर बैठकर
गाये जो नित राम नाम।
ऐसे कवि महा ऋर्षि को,
हम सब करते हैं नमन-प्रणाम।।
🙏रचना-:
सरोज डिमरी (स०अ०)
रा० उ० प्रा० वि० घतोड़ा
विकासखण्ड- कर्णप्रयाग
जिला- चमोली, उत्तराखण्ड
🙏संकलन- टीम हिम मन मन्थन उत्तराखण्ड
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धन्यवाद मिशन शिक्षण संवाद।
जवाब देंहटाएंशिक्षा का उत्थान
शिक्षक का सम्मान
और
मानवता का कल्याण
के लिए निरंतर प्रगतिपथ पर निरन्तर गतिमान
सरोज डिमरी