अन्नदाता- श्रीमती उषा सागर

 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला, हिम मन मन्थन में  प्रस्तुत है आज जनपद- पौड़ी गढ़वाल से शिक्षिका बहन श्रीमती उषा सागर जी द्वारा रचित कविता-:


*अन्नदाता*


शीत, मेह, धूप में तपता है जो,

मेहनत नित-नित करता रहता।

माटी में सोना उगलाने,

जुट जाता है कर्मठ किसान।।


चीर धरा का सीना वो,

पसीना खूब बहाता रहता।

हरे लहलहाते खेतों की हसरत में,

कठिन परिश्रम करता किसान।।


अन्न का एक-एक दाना उपजाने,

हर जन तक भोजन पहुंँचाने।

रात दिन व तपती धूप में मेहनत करके,

पसीना अपना बहाता किसान।।


जग की भूख मिटाने की खातिर,

अपनी भूख की न चिन्ता उसको।

एक-एक दाना सोने जैसा,

मेहनत से जुटाता किसान।।


रात्रि के अन्धकार में भी फसलों को,

अभिषिक्त, सिंचित करते जाना।

विषधर, व्याघ्र से निर्भय होकर,

कर्तव्य निर्वहन करता किसान।।


जब धरती उगलने लगती सोना,

नहीं चाहता किंचित भी खोना।

जंगली जानवरों से रखवाली कर,

घर-घर अन्न पहुंँचाता किसान।।


भूखा रहे न देश का बच्चा,

है उसकी उन्नत सोच महान।

अपने जीवन की परवाह न करता,

तेरा जीवन बचाने किसान।।


उसके मलिन वस्त्रों को देख,

न करना कभी उसका अपमान।

है वह अन्नदाता हमारा,

अपने देश की शान किसान।।



उनका अनादर करना बेईमानी है,

क्या तुमने उसकी कीमत न जानी है?

भूखे बिलखते दम तोड़ोगे, 

गर छोड़ दे परिश्रम करना किसान।।



देश के सैनिक और देश का किसान, 

हैं ये अपने गौरव और अभिमान।

इनके बिना नहीं अस्तित्व हमारा, 

यही तो हैं रक्षक हमारे सैनिक और किसान।।



🙏 रचना-:


उषा सागर (स०अ०) 

रा० उ० प्रा० वि० गुनियाल

विकास खण्ड- जयहरीखाल, पौड़ी गढ़वाल



🙏संकलन- टीम हिम मन मन्थन उत्तराखण्ड

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