महात्मा बुद्ध - श्रीमती सुशीला थपलियाल
📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला, हिम मन मन्थन में गौतम बुद्घ जयन्ती के सुअवसर पर प्रस्तुत है आज जनपद- रुद्रप्रयाग गढ़वाल से शिक्षिका बहिन श्रीमती सुशीला थपलियाल जी द्वारा रचित कविता-:
🙏🏻🕉️🙏🏻📝महात्मा बुद्ध
जन्म लुम्बिनी में मिला,
इक्ष्वाकु वंश था पाया।
शुद्धोधन पिता थे उनके,
और माता थी देवी माया।।
जन्म के सात दिवस ही बीते,
माँ दुनिया को छोड़ चली।
इस अपार दुखद घड़ी में,
मौसी गोमती आगे बढ़ी।।
नाम था सिद्धार्थ गौतम,
शाक्य कुल में जो हुए।
राजसी वैभव में पले-बढ़े,
वीतराग से भरे हुए।।
सारे सुख थे राजमहल में,
दुनियांँ से थे वे अनजान।
पाणिग्रहण यशोधरा से हुआ,
राजमहल था गुंजायमान।।
एक दिन उत्सुक्ता महल से,
बाहर जाने की हुई।
नियति के मंसूबे की,
जादुई घड़ी मालूम हुई।।
देख एक अर्थी कौतुहल बढ़ा,
क्या! है यह, ये जानने की चाह में।
जो गुजर रही थी उनके,
सामने ही राह में।।
सारथी से पूछ बैठे
सामने क्या जा रहा।
बोल बैठा सारथी
मानव कोई है मरा।
सबको जाना है ऐसे ही एक दिन,
कोई अमर नहीं है यहाँ।
जो आया है वो जाएगा,
एक दिन छोड़कर ये जहाँ।।
देखकर जहांँ का हाल ऐसा,
व्याकुल हुआ था मन।
सुन्दर सुकुमार के पिता बने,
पर अस्थिर हुआ था तन-मन।।
नाम राहुल था रखा गया,
पर बाँध नहीं उनको पाया।
अब तो घर छोड़ जाने का,
विचार उनके मन में आया।
छोड़ महलों का सारा सुख,
तब ले लिया ये फैसला।
तोड़कर मोह के बन्धनों को,
संन्यासी वो बन चला।।
हरि श्रवण तप के परम प्रताप से,
भ्रमण कर उपदेश देते रहे।
दूर देशों में जा-जाकर,
ज्ञानार्जन करते रहे।।
कनकमुनि और शाक्यमुनि भी,
कहे जाने लगे।
बौद्धधर्म के संस्थापक और,
अष्टांग गुरु भी जो हुए।।
सारनाथ की भूमि पर,
उपदेश प्रथम था दिया।
व्यग्रता में बौद्ध धर्म के प्रसार,
का संकल्प मन में था लिया।।
🙏रचना-:
सुशीला थपलियाल(प्र०अ०)
रा० प्रा० वि० पपड़ासू
वि० ख०-जखोली, जनपद-रुद्रप्रयाग
🙏संकलन- टीम हिम मन मन्थन उत्तराखण्ड


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