मन का दर्शन-श्रीमती सरोज डिमरी
📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला, हिम मन मन्थन में बुद्ध पूर्णिमा पावन पर्व के सुअवसर पर प्रस्तुत है आज जनपद- चमोली गढ़वाल से शिक्षिका बहन श्रीमती सरोज डिमरी जी द्वारा रचित कविता-:
🙏🏻🕉️🙏🏻📝मन का दर्शन
तन को यदि कष्ट हो,
तो इंसान झेल लेता है।
मन को यदि कष्ट हो,
तो असह्य वेदना होती है।।
ऐसा ही कुछ हुआ होगा,
जो राज-पाठ सुख त्याग किया।
पत्नी बच्चे का भी मोह न रहा,
सांसारिक सुख से वैराग्य लिया।।
लेकिन बौद्ध भिक्षुओं से भी,
सदा घिरे वे रहते थे।
मन के भाव व्यक्त करते,
अपने प्रवचन करते थे।।
विरक्तता उपेक्षा का भाव लेता,
जो कोई कुछ कहता उत्तर न पाता।
शिष्यों की तब उत्कण्ठा जागी,
जो उत्तर मिलता उपदेश बन जाता।।
ऐसे श्री बुद्ध भगवान को,
बार-बार प्रणाम है।
अति व्यग्रता मन की जागे,
तो उसका यह अंजाम है।।
जीवन की सुख सुविधा के लिए,
सदा ही सुरक्षित बने रहना।
अपने मन को शान्त रखना,
तन को सदा सक्रिय रखना।।
वक्त की हमेशा कद्र रखना,
भविष्य के लिए भी बचा कर रखना।
पांँव हमेशा धरती पर रखना
अहंकार में मत उड़ाना।।
अन्तरात्मा बन जाए शुद्ध,
ऐसी शिक्षा बुद्ध की।
संघे शक्ति कलयुगे,
यह शक्ति आत्म शुद्धि की।।
धर्म ही जीवन प्राण है,
सद्व्यवहार आचरण है।
बैर करो ना किसी से,
मित्रता ही आवरण है।।
कर्म कुछ करो ऐसा,
जो पछताना ना पड़े।
जीवन में आनन्द के साथ,
ब्रह्म उपासना में खड़े।।
ब्रह्मोपासना मूल मंत्र है,
सत्संगति है सार।
अच्युत पद की प्राप्ति में,
शरणागत संसार।।
बुद्धं शरणं गच्छामि।
धम्मं शरणं गच्छामि।।
संघं शरणं गच्छामि।
बुद्धं शरणं गच्छामि।।
🙏🏻सरोज डिमरी (स०अ०)
रा० उ० प्रा० वि० घतोड़ा
ब्लाॅक- कर्णप्रयाग, चमोली
🙏संकलन- टीम हिम मन मन्थन उत्तराखण्ड


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