तरु की पीड़ा- श्रीमती सुशीला थपलियाल
📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला, हिम मन मन्थन में पर्यावरण संरक्षण व संवर्द्धन के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत है आज जनपद- रुद्रप्रयाग गढ़वाल से शिक्षिका बहिन श्रीमती सुशीला थपलियाल जी द्वारा रचित कविता-:
🙏✍️🌳तरु की पीड़ा
जब धरा पर हम नहीं बच पायेंगे,
औलाद तेरी मनुज क्या रह पायेगी!
तपती धरा का तेज क्या सह पायेंगे?
बिन जलस्राव सावन में क्या रह पायेंगे।।
बिन तरु धरा वसनहीन हो जायेगी,
क्या तुझे ये देख लज्जा ना आयेगी!
अपनी महत्वाकांँक्षा के कारण तूने,
बेरहमी से मिटा डाले पादप कई।।
क्या मनुजता जरा नहीं तुझमें बची!
सब जान कर अज्ञान का चोला पहन।
क्यों बन रहा तू अनजान ऐसा!
क्या! धरा कर पायेगी ये सब सहन।।
अब भी संभल जागरूकता का पाठ पढ़,
हो सके अधिकाधिक वृक्ष रोपित कर।
मत बेरूखी से धरा का अपमान कर,
ना कमी हो नीर की तू संचित इसे कर।।
पश्चाताप के सिवा न कुछ बच पायेगा,
सब कुछ गवांँकर मनुज तू पछतायेगा।
बिना तरु के सांँस लेगा क्या यहाँ!
या तू कृत्रिम सांँस से चल पायेगा।।
प्रकृति ने चेताया तुझे है बार-बार,
पर ना समझ पाया तू ये सारा सार।
जब तक तेरी समझ में ये आयेगा,
तब तक धरा में क्या कुछ बच पायेगा।।
दो पेड़ जो कटे तो तू चार रोपित कर,
प्रकृति बचाकर पर्यावरण संरक्षित कर।।
🙏रचना-:
सुशीला थपलियाल(प्र०अ०)
रा० प्रा० वि० पपड़ासू
वि० ख०-जखोली, जनपद-रुद्रप्रयाग
🙏संकलन- टीम हिम मन मन्थन उत्तराखण्ड

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