प्रकृति की पीड़ा-श्रीमती उषा सागर
📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला, हिम मन मन्थन में प्रस्तुत है आज जनपद- पौड़ी गढ़वाल से शिक्षिका बहन श्रीमती उषा सागर जी द्वारा रचित पर्यावरण संरक्षण पर आधारित कविता-:
🙏🏻🌳📝प्रकृति की पीड़ा
प्रकृति ने देखो कैसा दिया है,
ये अद्भुत उपहार तुम्हें।
कहीं खिले हैं पुष्प-कलियांँ,
कहीं नव पल्लवित वृक्ष, लताएंँ।।
कहीं हुआ है पतझड़-पतझड़,
कहीं तप रहा है धरती का वक्षस्थल।।
कहीं जंगल धूं-धूं कर जल रहे,
पक्षियों के घर राख हो गए।
गर्मी से हर जीवन बेहाल है,
प्रदूषण बढ़ रहा है इतना।
सांँस लेना हो रहा दूभर है।।
क्यों मानव तू इतना बेरहम हो गया,
जंगलों को आग के हवाले कर रहा।
पशु-पक्षी,जीव-जन्तु सभी परेशान हैं,
जनजीवन भी बेहाल हुआ है।
मनुज हो मनुजता का न तनिक भान है।।
न करो तुम दुष्टता इतनी,
कुछ तो संजो लो इंसानियत।
आज जले घर बेजुबानों-लाचारों के,
कल हो सकती है तुम्हारी यूंँ ही दुर्दशा।
फिर मिल जाए तुम्हें थोड़ी सी सीख।।
हरे-भरे वन, वृक्ष सब झुलस गए हैं,
सुंदरता बिखेर रहे थे जो अपनी।
चहुँ ओर सब कालिख से भरे हुए हैं,
देखकर ऐसा मंजर आंँखें बरस रही हैं।
हरियाली के दर्शन को आंखें तरस रही हैं।।
आशा है उनको बादलों के घिर आने की,
राहत मिल जाए उन्हें धधकती ज्वाला से।
काया को कुछ शीतलता मिल जाए,
आसमान में उमड़-घुमड़ कर बरसें बादल।
व्याकुल धरा शान्त और तृप्त हो जाए।।
तपते शरीर की अग्नि शान्त हो,
और जीवन फिर से खुशहाल बने।
बारिश की प्यारी-प्यारी शीतल बूंदों से,
चहुँ दिशा हरियाली से पूरित हो जाएंँ।
जिससे धरा का रूप-श्रृंगार पूर्ण हो जाए।।
🙏रचना
उषा सागर (स०अ०)
रा० उ० प्रा० वि० गुनियाल
वि० ख० जयहरीखाल
पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखण्ड
🙏संकलन- टीम हिम मन मन्थन उत्तराखण्ड

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