भद्रा विचार- डॉ० आभा सिंह भैसोड़ा
📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला, हिम मन मन्थन में प्रस्तुत है आज जनपद नैनीताल से डाॅ० आभा सिंह भैसोड़ा जी द्वारा रचित कविता-:
🙏🏾🕉️🙏🏾✍️भद्रा का विचार
भद्रा होती सूर्य देवता की पुत्री,
बहिना होती हैं, शनि देव की।
मांँ का नाम है उनकी छाया,
लंबे केश उसके, काली काया।।
नाम भद्रा का है गुणकारी,
कर्म उतने ही हैं अशुभकारी।
भद्रा से क्यों होता परहेज,
उपस्थिति उसकी करे विघ्न विशेष।।
सूर्य देव को थी महान चिन्ता,
विवाह भद्रा का हो थी दुश्चिन्ता।
देवों से करते रहते प्रार्थना,
कैसे भद्रा न हो अभद्र मना।।
तब ब्रह्मा जी बोले हे भद्रा!
तुम पृथ्वी पर राज करोगी।
करे जो तुम्हारा अपमान,
उसका मिटा दो तुम नामनिशान।।
तब से भद्रा का सब करते परहेज,
जनेऊ, त्योहार कोई नया हो काम।
भद्र काल में दे देते हैं विश्राम,
प्रकोप से भद्रा के बचने को करते।।
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प्रातः काल स्मरण द्वादश नाम,
धन्या, दाधिमुखी, महामारी ,विष्टि।
खरानना, भद्रा, कालरात्रिका, महारुद्रा,
महाकाली, असुरक्षिकारी, कुलपुत्री, भैरवी।।
🙏🏻रचना-
डॉ आभा सिंह भैसोड़ा(स०अ०)
रा० प्रा० वि० देवलचौड़,
हल्द्वानी, नैनीताल
🙏संकलन- टीम हिम मन मन्थन उत्तराखण्ड

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