गढ़भोज- श्रीमती सरोज डिमरी
📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला, हिम मन मन्थन में प्रस्तुत है, उत्तराखण्ड के पारम्परिक भोज्य पदार्थों के महत्व को बताती हुई जनपद- चमोली से शिक्षिका बहन श्रीमती सरोज डिमरी जी द्वारा रचित कविता-:
🙏🏾✍️गढ़भोज
पहाड़ की विरासत है,
पहाड़ की अनूठी संस्कृति है।
अनाज एक देवता है,
अनाज से ही हम सन्तति हैं।।
पौष्टिकता इनमें बनी है,
और इससे होती है समृद्धि।
मोटे अनाजों का उत्पादन बढ़ाओ,
इससे अन्न की होती है वृद्धि।।
कोदा, झंगोरा, कोंणी, रागी,
यह होते हैं मोटे अनाज।
कम वर्षा पानी में भी,
जीवन देते हमको आज।।
यह पनपते विषम परिस्थिति में,
करते हैं सहन धूप या छांँव।
गढ़ भोज का पर्व मनाएंँ,
नमन प्रभु का छूकर पांँव।।
विद्यालय में इसे चलाएंँ,
कॉलेजों तक भी इसे बताएंँ।
जंक फूड को भोजन से हटाएंँ,
मोटे अनाज का उपयोग बढ़ाएंँ।।
प्रकृति का वरदान है,
यह कुदरत का वरदान है।
सृष्टि का अनमोल रतन,
किसानों का उत्पादन है।।
श्री द्वारिका प्रसाद सेमवाल जी ने,
अन्न से प्रेम जताया है।
इस प्यार प्रेम की पहचान अब
विश्व स्तर तक पहुंँचाया है।।
गढ़भोज की छटा निराली,
बच्चों ने प्रतिभा बिखेर ली।
व्यञ्जन और पकवान बनाकर,
निपुण भारत की शान बढ़ाई।।
अभिभावक भी खुश होकर,
इसमें भाग लेते इसको चखकर।
थोड़े-थोड़े अनाज लाकर,
गढ़ भोज को शानदार बनाकर।।
बढ़-चढ़कर बच्चे इसे मनाते,
मनपसन्द विषय अपनाते।
निबन्ध पेण्टिंग चित्रकारी से,
अपने अपने कौशल दिखाते।।
चुटक्व्वाणि, भटवाणि
गुड़, पापड़ी, पंजीरी पूजा।
रामदाना-चौलाई,
गथवानी, भट्टभूजा।।
अरसा, रोट, गुलगुला, मालपुआ,
लेथ्वा, बाड़ी, सूजी, हलुआ।
अरबी, आलू, पिण्डालू, तैड़ू
पल्यो, पत्यूड़ अर गुण्डळा।।
आओ! मिलकर गढ़भोज मनाएंँ,
पुरा-संस्कृति को आगे बढ़ाएंँ।
अपनी मूल कृषि का उत्पादन बढ़ाएंँ,
पहाड़ी मोटे अनाजों को अपनाएंँ।।
स्वयं भी खाएंँ और खिलायें,
अपना निज सम्मान बढ़ाएंँ।
जैविक खेती का उत्पादन,
मोटे अनाजों को भरपूर उगाएंँ।।
🙏रचना-:
सरोज डिमरी (स०अ०)
रा० उ० प्रा० वि० घतोड़ा
वि०ख०- कर्णप्रयाग, चमोली
🙏संकलन- टीम हिम मन मन्थन उत्तराखण्ड

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें