मेरी ब्वे बाणी- श्री मनोज घिल्डि़याल

 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला, हिम मन मन्थन में "अन्तरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के परिप्रेक्ष्य में "  प्रस्तुत है जनपद पौड़ी गढ़वाल से शिक्षक साथी श्री मनोज घिल्डि़याल जी द्वारा रचित गढ़वाली कविता-:


✍️🙏🏾मेरि ब्वे बाणी


हे मेरि ब्वे बाणी,

तेरि बड़ी मेहरबानी।

त्यार प्रताप सीख जाण सब धाणी,

तु जुगराज रै सदानी।।१।।


खट्टु, मिट्ठू, अलुण, मर्चण्या, कौलण्य, 

स्वाद कनु हूंद तिन बताई।

एड़ु-टडगार, गरम-चड़चड़ु, 

क्य हूंद त्यारा भ्वार चिताई।।२।।


भुज्याण, भुट्याण, खिखराण, कुतराण,

गंध तिली त सुंगाई।

पितलण्य, गौलण्य, खरसण्य,

रंगों तिल ज्ञान कराई।।३।।


गुमणाट, स्वींसाट, झुमणाट, बबड़ाट

कन हूंद तिल सुणाई।

खुद, पराज, भडुली, कुदगली,

हम फर तिल लगाई।।४।।



तेरि छाया, माया मुण्डमाथ, 

जु ब्यालि छाई हमरा। 

इन्नि माया ममता तेरि,

सदनि बणी राली दगड़ हमरा।।५।।


🙏रचना-:

मनोज घिल्डियाल 

रा० प्रा० वि० गाडियूंँ 

प्रखण्ड- रिखणीखाल 

जिला- पौड़ी गढ़वाल


🙏संकलन- टीम हिम मन मन्थन उत्तराखण्ड

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