होली - श्री गोविन्द बल्लभ भट्ट जी
📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला, हिम मन मन्थन में होली पावन पर्व के सुअवसर पर प्रस्तुत है जनपद पिथौरागढ़ से शिक्षक साथी श्री गोविन्द बल्लभ भट्ट जी द्वारा रचित कविता-:
🙏🏾✍️होली
तन भीगा अबीर, गुलाल से,
मन के तार भी भीगे।
रंग लो तुम प्रेम रंग में,
भैया यह तो होली है।।
धरती ने ली है अंगड़ाई,
बासन्ती फुहार चली।
हर कोंपल, खिलने को आतुर,
भैया यह तो होली है।।
पिचकारी में सज गए,
ये जाने, अनजाने रंग।
बच्चे करते हैं हुड़दंग,
भैया यह तो होली है।।
गुजिया की मिठास निराली,
छलके कहीं मय की प्याली,
खेतों में फैली हरियाली,
भैया यह तो होली है।।
सजनी खेलती सजना संग,
छलकाये प्यार की प्याली।
रंग खेलते देवर-भाभी,
भैया यह तो होली है।।
जाति धर्म के भेद मिटा दो,
हर मन में तुम प्रेम जगा दो।
क्यों पचड़ों में पड़े हो तुम!
भैय्या यह तो होली है।।
🙏रचना-:
गोविन्द बल्लभ भट्ट (मुसाफिर )
रा० आ० प्रा० वि० -अजेडा,
वि० ख०- डीडीहाट, पिथौरागढ़
🙏संकलन- टीम हिम मन मन्थन उत्तराखण्ड
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