उत्तराखण्ड अनाज दिवस- श्रीमती उषा सागर

 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला,  हिम मन मन्थन में  "उत्तराखण्ड अनाज दिवस" के सुअवसर पर प्रस्तुत है जनपद- पौड़ी गढ़वाल से शिक्षिका बहिन श्रीमती  उषा सागर जी द्वारा रचित कविता-:

🙏🌾✍️अनाज दिवस





जीवन की रक्षा करने की खातिर,


धरती का सीना चीरकर किसान।


मेहनत से अन्न उसमें उपजाते जो,


हैं अपने भूमिपुत्र हलधर महान।।




भिन्न-भिन्न, फसलें उपजाते,


धूप, वर्षा, सर्दी में तपते।


स्वयं भूखे-प्यासे रहकर,


घर अनाज से सबके भरते।।




खो गये बहुत से अनाज,


मिट गया वजूद जिनका।


पुकारती जननी है इनकी,


लौटा दो इन्हें वजूद इनका।।





कोदो-झंगोरा, ज्वार-बाजरा,


रह गये बस नाम ही इनके।


बच गए बस खेत कुछ ही,


सरसों, गेंहू और धान के।।




धरती उत्तराखण्ड की कभी,


उगलती थी सोना ही सोना।


आज पड़ा है सूना और रीता,


इस पुण्य धरा का हर एक कोना।।




लहलहाती थी फसलें यहाँ पर,


भरे रहते थे खेत-खलिहान।


आज हर तरफ दिखते हैं,


बंजर खेत और सूने मकान।।




लेकर कलेवा में मण्डुवे की रोटी,


गुड़ और छांँछ भरा गिलास।


पहुंँचते सब नर-नारी वहाँ,


जहाँ जोतता था खेत किसान।।




बैठ खेत के किनारे मिलजुल,


हल-बैलों सहित सभी के साथ।


बड़े चाव से खाते मण्डुवे की रोटी,


छांँछ, चटनी और गुड़ के साथ।।




लौट चलें आओ भाई-बहिनों,


अपने घर-गांँव अपने उत्तराखण्ड।


आबाद करें अपने सूने घर-खेतों को ,


दूर भगाएंँ बन्दर और जानवरों के झुण्ड।। 




🙏रचना- 


श्रीमती उषा सागर (स०अ०) 


रा० उ० प्रा० वि० गुनियाल              


वि० ख०- जयहरीखाल, पौड़ी गढ़वाल                ‌‌   


                                                                   








संकलन- टीम हिम मन मन्थन उत्तराखण्ड

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