माँ की महिमा- श्रीमती सुशीला थपलियाल
📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला, हिम मन मन्थन में "मातृ दिवस" के सुअवसर पर प्रस्तुत है जनपद- रुद्रप्रयाग से शिक्षिका बहिन श्रीमती सुशीला थपलियाल जी द्वारा रचित कविता-:
🙏✍️माँ की महिमा
ऐसी न कोई लेखनी माँ,
जो तेरे चित्रण को सजा दे।
कोई न ऐसी उक्ति,
जो तेरे वर्णन को निखारे।।
देखूँ मैं जब प्रकृति को तो,
हर रूप में तू ही तू दिखती।
छांँव में भी, धूप में भी,
कलियों तथा हर पुष्प में भी,
तेरी ही छटा है बिखरती।।
गुरु का स्वरूप देखा,
प्रथम पद में तुम मिली माँ।
मेरे हर सुख-दु:ख की घड़ी में,
सदा रही तुम खड़ी माँ।।
देवियों के स्वरूप का,
वर्णन सुना और पढ़ा जब-जब।
हर एक छवि में तुमको देखा,
हर एक मूरत में तुम गढ़ी माँ।।
मुश्किलों में चित्त मेरा,
व्यथित हो जब-जब भी रोया।
तुमने ही माँ धैर्य और साहस,
का सुन्दर बीज बोया।।
स्वर्ग की चाहत करुंँ क्या?
चरण तेरे जब-जब निहारूँ।
श्रेष्ठता तेरे गुणों को,
अपने जीवन में उतारूँ।।
🙏रचना-:
सुशीला थपलियाल (प्र०अ०)
रा० प्रा० वि० पपड़ासू
ब्लाॅक- जखोली, रुद्रप्रयाग
संकलन- टीम हिम मन मन्थन उत्तराखण्ड

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