आत्म-चिन्तन-श्रीमती इन्दु भट्ट जी

 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला,  हिम मन मन्थन में  प्रस्तुत है आज जनपद- रुद्रप्रयाग से शिक्षिका बहिन श्रीमती इन्दु जी द्वारा रचित कविता-:



 🙏🏾✍️आत्म-चिन्तन 


मुझे जीना आता है,

मुरझाना नहीं।

मुझे दीप जलाना आता है, 

दीप बुझाना नहीं।।


मेरी रोम-रोम में सांँस है, 

अपनेपन का एहसास है।

मुझे भी जीना आता है,

मुरझाना नहीं।।


मैं आत्म चिन्तन का परिचय हूंँ,

मैं सुख-दुख का अनुभव हूंँ। 

पर कभी-कभी निराशा में उलझ कर,

मैं मस्त रहना भूल जाती हूंँ।।



गहरी आत्मव्यथा में,

मैं मन्थन करती हूंँ।

पर कभी निराशा के बीच,

उलझ जाती हूंँ।।


घर के संस्कारों ने निष्ठा,

ईमानदारी का पाठ पढ़ाया।

जीवन में सुख-दुख का अनुभव, 

और प्रेम का उपहार बताया।।




सपनों का संसार है ये,

भाँति-भाँति के लोग यहांँ।

अभिव्यक्ति व स्वछन्दता का,

अधिकार है।।


भावनाओं व विचारों का,

बन्धन मुक्त है। 

सुख-दुख के दो पहलू हैं,

कभी सुख तो कभी दुख है।।



संघर्षों के मेले हैं,

सभी चलते मुसाफिर हैं।

जो चीज हमें चुनौती देती,

वही हमें जीवन में बदलना सिखाती।।


मुझे दीप जलाना आता है,

दीप बुझाना नहीं।

मुझे जीना आता है,

मुरझाना नहीं।।


🙏रचना-:

इन्दु भट्ट (स०अ०)

रा० उ० प्रा० वि० धारकोट

वि० ख०- अगस्त्यमुनि, रुद्रप्रयाग।



संकलन- टीम हिम मन मन्थन उत्तराखण्ड

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