दोहरी डगर-श्रीमती पुष्पा बहुगुणा
📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला, हिम मन मन्थन में एक महिला शिक्षक की व्यथा को उद्घाटित करते हुए प्रस्तुत है, आज जनपद- टिहरी गढ़वाल से शिक्षिका बहिन श्रीमती पुष्पा बहुगुणा जी द्वारा रचित कविता-:
🙏✍️ दोहरी डगर
सुबह किरणें जब पथ पर बिछतीं,
वो बस्ते में सपने सजा लेती है।
कन्धों पे चॉक और कापी का भार,
मन में घर का दीप जला लेती है।।
कक्षा की घण्टी जब बजती है तेज,
हर बच्चा उसका संसार बन जाता।
मुस्कानों की माला पिरोती है वो,
अपने आँसुओं को ओंस बना जाता।।
फिर घर की देहरी पर कदम रखती है,
जहाँ बिखरे खिलौने, थकी दीवारें हैं।
चूल्हे की आग, बर्तन की झंकार,
और अधूरे सपनों की पुकारें हैं।।
न भोजन का स्वाद, न विश्राम का पल,
बस जिम्मेदारियों की अनसुनी चाल है।
हर रिश्ते में समर्पण की लौ सी,
वो नारी नहीं, एक जीती मिसाल है।।
कभी माँ, कभी गुरु, कभी साथी बनी,
हर रूप में खुद को मिटा आयी है।
पर किसी ने न पूछा हाल उसका,
बस हर दफा मुस्कुराहट निभा आयी है।।
ओ समय! जरा ठहर तू एक पल,
कभी उसके दर्द की सुनवाई कर।
जो जीती है दोहरी डगर हर रोज,
उसकी थकान की सच्ची कमाई कर।।
🙏रचना-:
पुष्पा बहुगुणा (प्र०अ० )
रा० उ० प्रा० वि० पिपोला उठड़
विकासखण्ड- जाखणीधार
जिला- टिहरी गढ़वाल
🙏संकलन- टीम हिम मन मन्थन उत्तराखण्ड

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