हिन्दी की व्यथा-श्रीमती विनीता खाती
📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में हिन्दी दिवस के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत है, आज जनपद अल्मोड़ा से शिक्षिका बहिन श्रीमती विनीता खाती जी द्वारा रचित कविता-:
✍️हिन्दी की व्यथा
मैं राजभाषा हिन्दी हूँ,
सुनाती अपनी कहानी।
आपसे हूँ मैं परिचित,
और जानी पहचानी।।
मैं ही थी जो लोगों के,
हृदय में उमंग भरती थी।
मैं ही थी जो सबके,
दिलों में राज करती थी।।
मैं ही थी वह भाषा जो,
सबकी हमजोली थी।
घर-घर में सबसे प्यारी,
सबकी मैं सहेली थी।।
क्या हुआ न जाने?
अब मैं सबसे दूर हो गई।
अपने ही घर में अपनों से,
अब मैं पराई सी हो गई।।
अब कहाँ मिलता है मुझे,
वह पहले सा सम्मान।
अब तो घटता जा रहा,
प्रतिदिन ही मेरा मान।।
मुझे जानने वाले लोग,
कम पढ़े-लिखे हो गए।
टूटी-फूटी अंग्रेजी बोल,
वो बुद्धिमान हो गए।।
जब मुझे बोलने पर,
विद्यालय में दण्ड है मिलता।
तब महसूस करती हूँ मैं,
स्वयं का पतन होता।।
मातृभाषा बनकर मुझे,
होती है बड़ी निराशा।
अपने ही घर हो रही,
देखो! मेरी दुर्दशा।।
विचार-विमर्श संचार का,
माध्यम बनूंँ, थी अभिलाषा।
पर अब तो चर्चा में रहती है,
केवल अंग्रेजी भाषा।।
सिर्फ साल में एक दिन ही,
मुझे याद किया जाता है।
बाकी दिन तो मुझको फिर,
बस दुत्कारा जाता है।।
सुन हिन्दी की करुण व्यथा,
हृदय में होता बहुत आघात।
वास्तव में राजभाषा हिन्दी संग,
हो रहा बहुत बड़ा पक्षपात।।
✍️रचना-
डॉ० विनीता खाती (स०अ०)
रा० उ० प्रा० वि० गाड़ी
वि० ख०- ताड़ीखेत, अल्मोड़ा
🙏संकलन-
टीम हिम मन मन्थन उत्तराखण्ड

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