फागुण ब्यो - श्री मनोज घिल्ड़ियाल

 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला  "हिम मन मन्थन" में 'होली' पावन पर्व के सुअवसर पर प्रस्तुत है, आज  जनपद-पौड़ी, गढ़वाल से शिक्षक साथी श्री मनोज घिल्ड़ियाल जी द्वारा रचित कविता-:


🙏✍️फागुणा ब्यो🌷


एग्ये फागुण ख्यलणा होली,

बनि-बन्या रंग धौर्यां वैका थैली।

ल्हासण, प्याजै सग्वड़ी हरी बणी,

हरिं-भरिं ग्यूं अर जौ सारि फैली।।


पिंगली हलदण्य लय्या ल्हेकी,

कब्लयिं च पिंगला रंगै की फ्योंली।

लाल ललंगा आरू फुलैकी,

डाण्ड्यू खितकणू बुरांश डाली।।


हिसोलौं नारंगी ट्वपला पैरैकी,

सकिन्या फुल्यां भ्यालों गुलाली।

मेळू ग्विराल चांदी रंगै की,

किनगोड़ै बणी च सतरंगी डाळी।।



चखुला उड़ना च्वींचाट कैकी,

भौंरो कु गुमणाट अपणि बोळी।

गोरू बछलु दोड़ना पुछड़ी उठैकी,

चौंखेणा मुण्ड मोल माटु ढोळी।



उड़ंदु हूंणू सरैल देख-देखि की,

ज्यू ब्वाद मीबि खेलूं आज होली।

एग्या फागुण ख्यलणा होली,

बनि-बन्या रंग धौर्यां वैका थैली।


🙏रचना:-

मनोज घिल्ड़ियाल (प्र०अ०) 

रा० प्रा० वि० गाड़ियूंँ

वि० ख०- रिखणीखाल 

जनपद- पौड़ी

🙏संकलन- टीम हिम मन मन्थन उत्तराखण्ड

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